पटना, 27 अगस्त 2026 । बिहार में बाढ़ के मंडराते खतरे के बीच जन सुराज के नेता प्रशांत किशोर ने सरकार की तैयारियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि हर साल बाढ़ का संकट सामने आने के बावजूद सरकार की ओर से स्थायी समाधान की दिशा में पर्याप्त काम नहीं किया जाता और केवल लीपापोती से काम चलाया जाता है।
प्रशांत किशोर की बाढ़ पर प्रतिक्रिया
पीके ने एक सवाल के जवाब में कहा कि प्रशांत किशोर ने इसके बाद छात्रों के आंदोलन के सवाल पर कहा कि बच्चों की जो जायज मांग है, वो सरकार को माननी चाहिए। इन लोगों ने कहा था कि 25 लाख नौकरी देंगे। तो टीआरई-4 इनको तुरंत करना चाहिए। उसमें नये नियम कानून जो सरकार ने लगाए हैं। उसका छात्र विरोध कर रहे हैं। उसको नहीं करना चाहिए। दोनों जगहों पर उनकी सरकार है। लोगों से मिलना ही चाहिए।
बाढ़ को लेकर सरकार की तैयारी पर सवाल
प्रशांत किशोर का कहना है कि बिहार में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। इसके बावजूद समय रहते ऐसी प्रभावी व्यवस्था तैयार नहीं की गई, जिससे बार-बार आने वाली बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सके। उन्होंने सरकार से कागजी दावों के बजाय जमीन पर ठोस कदम उठाने की मांग की है।
जल प्रबंधन को बताया स्थायी समाधान
प्रशांत किशोर पहले भी बिहार में बाढ़, जलजमाव और सूखे की समस्याओं को एक साथ देखने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि राज्य के लिए अलग-अलग इलाकों और नदियों के आधार पर काम करने के बजाय एक व्यापक जल प्रबंधन नीति जरूरी है।
नेपाल से आने वाले पानी पर भी नजर
बिहार में बाढ़ की स्थिति पर नेपाल में होने वाली बारिश और वहां से आने वाले पानी का भी असर पड़ता है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार गंडक नदी के जलप्रवाह में उतार-चढ़ाव पर नेपाल की स्थिति का प्रभाव देखा जा रहा है। ऐसे में सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासन को जलस्तर और संभावित बाढ़ की स्थिति पर लगातार निगरानी रखनी पड़ रही है।
सरकार से स्थायी समाधान की मांग
प्रशांत किशोर ने सरकार को केवल राहत और तात्कालिक प्रबंधन तक सीमित रहने के बजाय बाढ़ के मूल कारणों पर काम करने की सलाह दी है। उनके मुताबिक बिहार में बाढ़, जलजमाव और सूखे को अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखने के बजाय एकीकृत जल प्रबंधन के जरिए समाधान तलाशना चाहिए।
बिहार में बाढ़ का खतरा बढ़ने के साथ ही प्रशांत किशोर का यह बयान सरकार की तैयारियों और आपदा प्रबंधन को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है। आने वाले दिनों में नदी जलस्तर और मौसम की स्थिति के आधार पर प्रभावित इलाकों में प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है।