नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026 । अवैध निर्माण और अनधिकृत ढांचों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि पूरे देश में भवनों के निर्माण और उनके नियमितीकरण के लिए एक जैसा नियम लागू करना व्यावहारिक नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि अलग-अलग राज्यों और स्थानीय निकायों की भौगोलिक परिस्थितियां, विकास की जरूरतें और भवन निर्माण से जुड़े नियम अलग होते हैं। ऐसे में अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में स्थानीय परिस्थितियों और संबंधित कानूनों को ध्यान में रखना जरूरी है।
- चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियां और जमीनी वास्तविकताएं काफी अलग हैं।
- ऐसे में पूरे देश के लिए एक समान नीति तय करना न तो व्यावहारिक होगा और न ही उचित।
- पीठ ने उम्मीद जताई कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश नई नीतियां बनाते समय या मौजूदा नीतियों की समीक्षा करते समय याचिका में उठाए मुद्दों पर उचित विचार करेंगे।
- यह याचिका सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस ने दाखिल की थी।
- इसमें खासकर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लंबे समय से बने अनधिकृत आवासों को अचानक ध्वस्त किए जाने से बचाने के लिए नीति बनाने की मांग की गई थी।
- याचिकाकर्ता ने कहा कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्यों में अनधिकृत बस्तियों और निर्माणों के नियमितीकरण की योजनाएं हैं, लेकिन कई जगह बिना पर्याप्त नोटिस के ध्वस्तीकरण कर दिया जाता है।
- प्रभावित परिवारों के पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था भी कई मामलों में नहीं होती। ध्वस्तीकरण कठोर कदम है।
ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध और अनधिकृत ध्वस्तीकरण के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय कर चुका है। अनधिकृत कब्जाधारी को भी ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, याचिका में उठाए मुद्दों का समाधान हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना होगा। कोई समिति राज्य सरकारों और नगर निकायों को कानून लागू करने के अधिकारों का स्थान नहीं ले सकती।
राज्यों के अलग-अलग कानून बड़ी वजह
भारत में शहरों और राज्यों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। महानगरों में भूमि की कमी, घनी आबादी और ऊंची इमारतों से जुड़े अलग नियम हो सकते हैं, जबकि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण का स्वरूप अलग होता है। पहाड़ी, तटीय और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में भी अतिरिक्त प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।
ऐसे में देशभर के लिए एक समान निर्माण नियम लागू करने की कोशिश कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक कानूनी और प्रशासनिक संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
आम लोगों और बिल्डरों के लिए क्या संदेश?
इस रुख से यह संदेश जाता है कि निर्माण करने से पहले संबंधित स्थानीय निकाय से जरूरी मंजूरी लेना बेहद महत्वपूर्ण है। नक्शे की स्वीकृति, भूमि उपयोग और अन्य वैधानिक अनुमति के बिना निर्माण करने पर कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
वहीं बिल्डरों और डेवलपर्स के लिए भी यह जरूरी है कि वे परियोजनाओं को स्थानीय भवन उपनियमों और स्वीकृत नक्शे के अनुरूप ही विकसित करें। नियमों की अनदेखी बाद में निर्माण पर कार्रवाई, जुर्माने या अन्य कानूनी विवाद का कारण बन सकती है।
अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह साफ है कि अवैध निर्माण को लेकर नियमों के पालन और स्थानीय प्रशासन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, देश के अलग-अलग हिस्सों की परिस्थितियों को देखते हुए निर्माण कानूनों को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समझना जरूरी है।
आने वाले समय में इस तरह के मामलों में अदालतों और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि विकास की जरूरतों और भवन नियमों के पालन के बीच संतुलन बनाया जाए। इससे एक ओर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं दूसरी ओर शहरों का नियोजित और टिकाऊ विकास भी संभव हो सकेगा।