वैवाहिक विवाद को अकेले आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता
इलाहाबाद HC ने पति को किया बरी
लखनऊ, 08 अगस्त 2026 । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक विवाद या पति-पत्नी के बीच मतभेद को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा कोई कृत्य किया या ऐसा व्यवहार किया, जिसने मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया।
कोर्ट ने कहा कि जब सुसाइड से पांच माह 12 दिन पहले से पति-पत्नी के बीच कोई संपर्क या संवाद नहीं था, तो पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने अंकुर टंडन की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला और सजा निरस्त कर दी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 498-ए, 306 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराया था।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी कर दिया। अदालत का यह फैसला आपराधिक मामलों में आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) के आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी कसौटी को रेखांकित करता है।
सिर्फ पति-पत्नी के बीच विवाद पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने माना कि वैवाहिक जीवन में विवाद, मतभेद या तनाव अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का कानूनी आधार नहीं बन जाता। ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना पड़ता है कि आरोपी के व्यवहार और आत्महत्या के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध था।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति को केवल वैवाहिक संबंधों में विवाद होने के कारण आत्महत्या के लिए उकसाने का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आरोप को साबित करने के लिए ठोस परिस्थितिजन्य और अन्य साक्ष्य आवश्यक हैं।
दोषसिद्धि के खिलाफ पति ने की थी अपील
मामले में निचली अदालत ने पति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दोषसिद्धि को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने देखा कि अभियोजन द्वारा पेश परिस्थितियां आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध को आवश्यक कानूनी स्तर तक साबित नहीं करती थीं। इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि को बरकरार रखने के बजाय आरोपी पति को बरी कर दिया।
आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में जरूरी है स्पष्ट भूमिका
आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में केवल यह तथ्य पर्याप्त नहीं होता कि मृतक आरोपी के साथ किसी विवाद या तनावपूर्ण रिश्ते में था। अदालत को यह देखना होता है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए प्रेरित करने, सहायता देने या जानबूझकर ऐसी परिस्थिति पैदा करने में कोई स्पष्ट भूमिका निभाई थी या नहीं।
इस फैसले से यह कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि वैवाहिक कलह और आत्महत्या के लिए कानूनी रूप से उकसाने के बीच अंतर करना जरूरी है। हर वैवाहिक विवाद को आपराधिक उकसावे की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
फैसले का क्या है महत्व?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जहां वैवाहिक विवाद के बाद आत्महत्या होने पर पति या परिवार के सदस्यों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज किया जाता है। अदालत का रुख यह स्पष्ट करता है कि केवल रिश्ते में तनाव या विवाद के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि गंभीर उत्पीड़न, जानबूझकर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने या ऐसे कृत्यों से जुड़े मामलों में आरोपी को राहत मिल जाएगी। प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और उसकी विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय फैसला करता है।