वॉशिंगटन, 24 जुलाई 2026 । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। सऊदी अरब के साथ संभावित परमाणु सहयोग समझौते को लेकर आई खबरों के बीच ट्रंप के ताजा बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। रिपोर्टों के अनुसार, परमाणु समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत देने के कुछ ही समय बाद ट्रंप का रुख बदला हुआ नजर आया, जिससे इस मुद्दे पर कई तरह की अटकलें लगने लगी हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने समझौते में नई शर्त जोड़ दी है। उन्होंने कहा कि डील तभी आगे बढ़ेगी, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल से राजनयिक रिश्ते सामान्य करेगा।
बिना बताए डील की घोषणा से ट्रम्प नाराज
वॉशिंगटन में हुए हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प इस बात से नाराज थे कि राइट ने उनकी मंजूरी के बिना समझौते की घोषणा कर दी। इसके बाद फॉक्स न्यूज और वॉल स्ट्रीट जर्नल में हुई आलोचना से उनकी नाराजगी और बढ़ गई।
रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस ने ऊर्जा विभाग से समझौते की घोषणा टालने को कहा था, लेकिन विभाग ने हस्ताक्षर समारोह भी किया और मीडिया में इसकी जानकारी भी दी। हालांकि व्हाइट हाउस का कहना है कि अब्राहम अकॉर्ड्स की शर्त शुरू से ही ट्रम्प की नीति का हिस्सा थी। वहीं ऊर्जा विभाग ने किसी भी मतभेद से इनकार किया।
विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते का संबंध केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की रणनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है। ऐसे समझौतों में परमाणु तकनीक, सुरक्षा मानकों, अंतरराष्ट्रीय निगरानी और अप्रसार (Non-Proliferation) से जुड़े कई संवेदनशील पहलू शामिल होते हैं।
ट्रंप के बदले हुए रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे बदलते कूटनीतिक समीकरणों से जोड़ रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, इस मुद्दे पर अमेरिका की आधिकारिक नीति और अंतिम निर्णय संबंधित सरकारी घोषणाओं के बाद ही स्पष्ट होंगे।
सऊदी अरब लंबे समय से अपने असैन्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत है। वहीं अमेरिका इस तरह के किसी भी समझौते में सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय नियमों और परमाणु अप्रसार से जुड़े प्रावधानों को महत्वपूर्ण मानता है।
इस घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है, क्योंकि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु सहयोग से जुड़ा कोई भी फैसला क्षेत्रीय सुरक्षा, वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा राजनीति पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।