पटना, 05 जून् 2026 । बिहार की एमएलसी चुनावी राजनीति में टिकट वितरण के साथ ही सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। एनडीए और महागठबंधन दोनों ने कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया है। राजनीतिक दलों ने इस बार जीत की संभावना, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता देते हुए कई चौंकाने वाले फैसले लिए हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, टिकट वितरण में सबसे बड़ा फोकस जातीय और सामाजिक गणित पर रहा। एनडीए ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति अपनाई, जबकि महागठबंधन ने नए सामाजिक समूहों और स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की। कई सीटों पर वर्षों से चुनाव लड़ते आ रहे नेताओं को इस बार मौका नहीं मिला, जिससे कुछ दलों के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं।
महागठबंधन में सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन को लेकर लंबे समय तक मंथन चला। कांग्रेस, राजद और सहयोगी दलों के बीच कई सीटों पर सहमति बनाने में समय लगा। इस प्रक्रिया में कुछ पुराने दावेदारों को टिकट नहीं मिल पाया, जबकि कई नए चेहरों को मैदान में उतारा गया। टिकट वितरण को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी और विरोध की खबरें भी सामने आईं।
वहीं एनडीए ने भी कई सीटों पर बदलाव कर स्पष्ट संकेत दिया कि पार्टी नेतृत्व केवल वरिष्ठता नहीं बल्कि जीत की क्षमता को प्राथमिकता दे रहा है। भाजपा, जदयू और अन्य सहयोगी दलों ने स्थानीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि चुनावी रेस में फिलहाल वे उम्मीदवार आगे माने जा रहे हैं जिनकी स्थानीय पकड़ मजबूत है, जिनके पक्ष में जातीय समीकरण अनुकूल हैं और जो संगठन के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। दूसरी ओर कई चर्चित चेहरे टिकट कटने या सीट बदलने के कारण चुनावी दौड़ से बाहर हो गए हैं। अब मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं बल्कि नए और पुराने नेतृत्व के बीच भी माना जा रहा है। टिकट वितरण के फैसले यह संकेत दे रहे हैं कि बिहार की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया तेज हो रही है और दल भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर नए चेहरों पर भरोसा जता रहे हैं।