महिला आरक्षण पर सियासत तेज—प्रियंका गांधी की चुनौती से बढ़ा राजनीतिक तापमान

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नई दिल्ली, 18 अप्रैल 2026 । महिला आरक्षण के मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस महासचिव Priyanka Gandhi ने केंद्र सरकार को सीधी चुनौती देते हुए कहा है कि अगर सरकार वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति गंभीर है, तो सोमवार को संसद में पुराना महिला आरक्षण बिल लाकर दिखाए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ऐसा करने से “दूध का दूध और पानी का पानी” हो जाएगा, यानी सरकार की मंशा साफ हो जाएगी कि वह वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देना चाहती है या सिर्फ मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

देखते हैं कौन महिला विरोधी है: प्रियंका

विशेष सत्र के आखिरी दिन मीडिया से बात करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा, “सरकार को वह पुराना महिला आरक्षण बिल लाना चाहिए जिस पर पहले से ही सभी दलों की सहमति थी। सोमवार को संसद बुलाइए, बिल पेश कीजिए और फिर देखते हैं कि कौन महिला विरोधी है। हम सभी (विपक्ष) आपका समर्थन करेंगे और वोट देंगे।”

प्रियंका गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है जब महिला आरक्षण को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। यह मुद्दा नया नहीं है, बल्कि दशकों से संसद और राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करना है, जिससे राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ सके। हालांकि, इस बिल को लेकर विभिन्न दलों के बीच सहमति बनना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही है कि मौजूदा सरकार महिला आरक्षण के नाम पर केवल घोषणाएं करती है, लेकिन ठोस कदम उठाने से बचती है। वहीं, सरकार का पक्ष यह रहा है कि वह महिला सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं चला रही है और सही समय आने पर उचित कदम उठाए जाएंगे। इस बीच प्रियंका गांधी का यह बयान राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है और विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास भी माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, क्षेत्रीय और जातीय समीकरण भी शामिल हैं। कई दलों का मानना है कि आरक्षण के भीतर भी उप-कोटा होना चाहिए, ताकि सभी वर्गों की महिलाओं को समान अवसर मिल सके। यही कारण है कि यह बिल अब तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है।

प्रियंका गांधी की इस चुनौती के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है। अगर सरकार इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाती है, तो यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है। वहीं, अगर यह केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है, तो यह मुद्दा आगामी चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।

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