मणिपुर में ‘जानवरों की आवाज़’ वाली अफवाह — संवेदनशील माहौल में भ्रामक दावों से बढ़ रहा तनाव

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इंफाल, 28 जनवरी 2026 । मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में हाल के समय में एक अजीब दावा सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है कि एक विशेष समुदाय के लोग रात में जानवरों जैसी आवाज़ें निकालकर लोगों को डरा रहे हैं। इस तरह की खबरें तेजी से वायरल होती हैं, लेकिन इनकी विश्वसनीयता, स्रोत और उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। किसी भी जातीय या सामुदायिक समूह का नाम जोड़कर डर या संदेह का माहौल बनाना स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

मणिपुर की राजधानी इम्फाल वेस्ट से 25 किलोमीटर दूर आखिरी गांव कौत्रुक चिंग लेइकाई में लोग हिंसा के ढाई साल बाद भी दहशत में हैं।

यहां के लोगों का आरोप की कुकी समुदाय के लोग उन्हें उकसाने के लिए रात में जानवरों की आवाज निकलते हैं। उनका कहना है कि कुकी चाहते हैं कि गांव वाले इसका जवाब दें जिससे कुकी उनपर हमला कर सकें।

वहीं, मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में सोमवार को उग्रवादियों ने कई घरों और फार्महाउसों में आग लगा दी। के सोंग्लुंग गांव में हुई घटना की जिम्मेदारी जेलियांग्रोंग यूनाइटेड फ्रंट ने ली। फ्रंट ने आरोप लगाया है कि इन घरों, फार्महाउसों में अफीम की अवैध खेती की जा रही थी।

प्रशासनिक सूत्र अक्सर ऐसी स्थितियों में लोगों से अपील करते हैं कि वे बिना पुष्टि वाली सूचनाएँ साझा न करें। किसी भी घटना की सच्चाई केवल जांच एजेंसियाँ ही स्पष्ट कर सकती हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित ऑडियो या वीडियो क्लिप्स संदर्भ से काटकर पेश किए जा सकते हैं, जिससे गलत नैरेटिव बनता है।

मणिपुर का सामाजिक ताना-बाना पहले ही जातीय तनाव से प्रभावित रहा है। ऐसे में किसी भी समुदाय—चाहे वह कुकी हो, मैतेई हो या कोई अन्य—को लेकर सनसनीखेज दावे करना शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुँचा सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अफवाहें अक्सर वास्तविक घटनाओं से ज्यादा खतरनाक साबित होती हैं, क्योंकि वे बड़े पैमाने पर डर और गलतफहमियाँ पैदा करती हैं।

इसलिए जरूरी है कि लोग आधिकारिक सूचना पर भरोसा करें, स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें और शांति बनाए रखने में सहयोग दें। मीडिया और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे तथ्यों की पुष्टि के बिना किसी समुदाय विशेष पर आरोप लगाने वाली सामग्री को बढ़ावा न दें।

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