बांग्लादेश में हिंसा की इंतहा, 7 साल की बच्ची को जिंदा जलाने की घटना से देश स्तब्ध

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नई दिल्ली, 20 दिसंबर 2025 । बांग्लादेश में सामने आई हिंसा की एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा के दौरान 7 साल की मासूम बच्ची को जिंदा जला दिया गया, जिससे मानवता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस घटना के बाद न केवल स्थानीय इलाकों में आक्रोश फैल गया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी कड़ी निंदा हो रही है। मासूम की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि हिंसा का सबसे बड़ा शिकार निर्दोष लोग बनते हैं।

घटना ऐसे समय में सामने आई है, जब देश के कुछ हिस्सों में पहले से ही तनावपूर्ण हालात बने हुए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हिंसा के दौरान हालात बेकाबू हो गए और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इसी अफरा-तफरी में बच्ची इसकी चपेट में आ गई। घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों ने इलाके में अतिरिक्त तैनाती कर दी है और हालात को काबू में लाने की कोशिश की जा रही है।

बांग्लादेश के लक्ष्मीपुर सदर में शुक्रवार देर रात कुछ उपद्रवियों ने एक घर को बाहर से बंद कर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। आग में जिंदा जलने से एक 7 साल की बच्ची की मौत हो गई, जबकि तीन लोग गंभीर रूप से झुलस गए।

यह घर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता बिलाल हुसैन का है। पुलिस के मुताबिक घटना रात करीब 1 बजे की है। आग लगने से बिलाल की 7 साल की बेटी आयशा अख्तर की मौके पर ही मौत हो गई।

वहीं बिलाल हुसैन और उनकी दो अन्य बेटियां सलमा अख्तर (16) और सामिया अख्तर (14) गंभीर रूप से झुलस गईं। बिलाल का इलाज लक्ष्मीपुर सदर अस्पताल में चल रहा है, जबकि दोनों बेटियों को गंभीर हालत में ढाका भेजा गया है।

सरकार की ओर से मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है। मानवाधिकार संगठनों ने इस घटना को गंभीर अपराध बताते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और ऐसी घटनाएं प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करती हैं।

इस हृदयविदारक घटना के बाद पूरे समाज में शोक और गुस्से का माहौल है। सोशल मीडिया पर लोग पीड़ित परिवार के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं और हिंसा के खिलाफ एकजुट होने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक हिंसा की जड़ में मौजूद कारणों को गंभीरता से नहीं सुलझाया जाएगा, तब तक ऐसे अमानवीय हादसों को रोकना मुश्किल होगा।

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