परिचय
उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर सेवा तीर्थयात्रियों के लिए समय बचाने और दुर्गम स्थानों तक पहुंचने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन ऊंचे पहाड़, तेजी से बदलता मौसम, सीमित दृश्यता और संकरे उड़ान मार्ग इसे जोखिमपूर्ण भी बनाते हैं। 30 अक्टूबर 2026 को चमोली जिले के जोशीमठ क्षेत्र में छाई गांव के पास बदरीनाथ से लौट रहा ट्रांस भारत एविएशन का हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें पायलट सहित सभी छह लोगों की मौत हो गई। इस हादसे के बाद नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने चारधाम चार्टर उड़ानों के लिए दो पायलट अनिवार्य करने सहित अतिरिक्त सुरक्षा निर्देश जारी किए ।
DGCA ने दो पायलट का नियम क्यों लागू किया?
DGCA का उद्देश्य उड़ान के दौरान निर्णय लेने की क्षमता और निगरानी को मजबूत करना है। पहाड़ी उड़ान में पायलट को मौसम, बादलों, ढलानों, बिजली की तारों, हवा की दिशा और हेलिपैड की स्थिति पर लगातार नजर रखनी पड़ती है। दूसरे, पर्वतीय उड़ान के लिए योग्य पायलट की मौजूदगी से एक अतिरिक्त सुरक्षा परत मिलती है। आपात स्थिति, तकनीकी समस्या या पायलट की अस्वस्थता में सह-पायलट मदद कर सकता है और जरूरत पड़ने पर नियंत्रण संभाल सकता है। हालांकि, दो पायलट होना दुर्घटना न होने की गारंटी नहीं है; यह जोखिम कम करने वाला उपाय है ।
नए नियमों में और क्या बदलाव किए गए हैं?
दो पायलट की व्यवस्था के साथ DGCA ने प्रत्येक उड़ान चरण से पहले देहरादून के सहस्रधारा नियंत्रण कक्ष से गंतव्य और मार्ग की स्पष्ट अनुमति लेना जरूरी किया है। इसके अलावा, हर गंतव्य हेलिपैड पर उतरने के बाद चालक दल को पायलट रिपोर्ट (PIREP) जमा करनी होगी। इसमें रास्ते में मिले मौसम और अन्य परिचालन परिस्थितियों की जानकारी दर्ज की जाएगी, ताकि अगली उड़ान के पायलट उपलब्ध ताजा जानकारी के आधार पर निर्णय ले सकें। सह-पायलट का पहाड़ी क्षेत्र में उड़ान के लिए योग्य होना भी अनिवार्य है ।
हेलीकॉप्टर ऑपरेटर इन नियमों का विरोध क्यों कर रहे हैं?
ऑपरेटरों का तर्क है कि हर उड़ान में दूसरा योग्य पायलट रखने से वेतन, प्रशिक्षण, ठहरने और परिचालन खर्च बढ़ेंगे। 11 ऑपरेटरों ने DGCA को लिखे पत्र में कहा कि मौजूदा किराये और सीमित व्यावसायिक लाभ के बीच अतिरिक्त लागत उठाना कठिन होगा। उन्होंने नियमों पर पुनर्विचार और व्यवहारिक समाधान के लिए बातचीत की मांग की तथा 2 नवंबर से चारधाम चार्टर सेवाएं रोकने की चेतावनी दी । सुरक्षा और व्यावसायिक व्यवहार्यता के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन लागत का तर्क यात्रियों की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
क्या दो पायलट का नियम पर्याप्त है?
हमारे विचार में यह जरूरी कदम है, लेकिन इसे व्यापक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए। मौसम की स्वतंत्र और समयबद्ध निगरानी, उड़ान से पहले सख्त जोखिम आकलन, पायलटों का नियमित सिम्युलेटर प्रशिक्षण, ड्यूटी समय और थकान पर नियंत्रण तथा हेलिपैड और मार्गों का तकनीकी निरीक्षण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सरकारी स्तर पर नियंत्रण कक्षों और मौसम सूचना प्रणाली को प्रभावी बनाए रखना होगा।
निष्कर्ष
बदरीनाथ के पास हुआ हादसा याद दिलाता है कि हिमालयी हवाई सेवाओं में छोटी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। दो पायलट, पूर्व उड़ान अनुमति और लैंडिंग के बाद रिपोर्टिंग जैसे नियम सुरक्षा की दिशा में सकारात्मक कदम हैं। अब DGCA और राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी है कि इनका समान रूप से पालन कराएं और ऑपरेटरों के साथ व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करें। तीर्थयात्रियों का भरोसा तभी लौटेगा, जब हर उड़ान में सुविधा और कारोबार से पहले जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।