अमृतसर , 22 अक्टूबर 2026। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के देश से नक्सलवाद समाप्त होने के दावे को लेकर राजनीतिक बहस सामने आई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के एक सांसद ने सवाल उठाया है कि यदि नक्सलवाद खत्म हो चुका है, तो एक पूर्व सांसद को इसके खतरे के मद्देनजर सुरक्षा क्यों दी जा रही है? इस सवाल के जरिए नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार के दावे पर चर्चा शुरू हो गई है।
गौरतलब है कि अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में कहा था कि देश नक्सलवाद से मुक्त हो गया है और छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है। उन्होंने सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास योजनाओं को इस सफलता का प्रमुख कारण बताया था।
अमित शाह के दावे पर राजद सांसद के सवाल
राजद सांसद अभय कुशवाहा ने सवाल पूछा है कि अगर देश से नक्सलवाद समाप्त हो चुका है, तो फिर नक्सलवाद के नाम पर औरंगाबाद के पूर्व सांसद सुशील कुमार सिंह के साथ-साथ देश के तमाम बड़े नेताओं को Y+ श्रेणी और Z+ श्रेणी की सुरक्षा क्यों दी जा रही है? सांसद ने कहा कि पूर्व सांसद सुशील कुमार सिंह समेत कई लोग हैं जो सालों से नक्सल प्रभावित होने का हवाला देकर सुरक्षा ले रहे हैं।
नक्सलवाद पर सरकार और विपक्ष के बीच बहस
नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की सफलता को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच पहले भी मतभेद सामने आए हैं। सरकार सुरक्षा अभियानों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि बताती रही है। दूसरी ओर, विपक्षी नेताओं ने समय-समय पर इस बात पर जोर दिया है कि सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का आकलन जमीनी परिस्थितियों और स्थानीय लोगों की स्थिति के आधार पर होना चाहिए।
गृह मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि नक्सल प्रभावित रहे कुछ क्षेत्रों में स्थिति को स्थायी रूप से सामान्य बनाए रखने के लिए सुरक्षा निगरानी और विकास संबंधी सहायता जारी रखने की आवश्यकता है।
RJD सांसद के सवाल के बाद इस मुद्दे पर चर्चा का केंद्र यह है कि नक्सलवाद समाप्त होने के दावे और सुरक्षा संबंधी फैसलों को किस तरह समझा जाए। किसी व्यक्ति को सुरक्षा दिए जाने की वास्तविक वजह जानने के लिए संबंधित सुरक्षा समीक्षा और आधिकारिक जानकारी जरूरी होगी।
नोट: संबंधित RJD सांसद और पूर्व सांसद का नाम तथा उन्हें सुरक्षा दिए जाने की विशिष्ट वजह की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इस मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक बयान या मूल रिपोर्ट देखना जरूरी है।