पटना, 12 सितंबर 2026। बिहार में आरक्षण को लेकर सियासत एक बार फिर तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे और हम (सेक्युलर) नेता संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का एक नया सुझाव दिया है। उन्होंने ‘रोटेशन सिस्टम’ की वकालत की है। उनके प्रस्ताव के मुताबिक आरक्षण का लाभ एक ही वर्ग तक सीमित रहने के बजाय तय समय के बाद अलग-अलग वंचित समूहों के बीच घूमता रहे, ताकि ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद लोगों को इसका फायदा मिल सके।
आरक्षण में ‘रोटेशन प्रणाली’ की वकालत
नरकटियागंज में आयोजित कार्यक्रम में संतोष कुमार सुमन ने कहा कि जब तक आरक्षण में रोटेशन प्रणाली लागू नहीं होगी, तब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचितों का अपेक्षित विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का सही लाभ सही लोगों तक पहुंचाने के लिए संबंधित पक्षों और नीति-निर्माताओं को साथ बैठकर गहन समीक्षा करने की जरूरत है।
मांझी परिवार की आरक्षण पर अलग लाइन
जीतन राम मांझी भी लंबे समय से आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर मुखर रहे हैं। सुमन का ताजा सुझाव इसी राजनीतिक लाइन को आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है। खास तौर पर बिहार में विभिन्न जातीय और सामाजिक समूहों के बीच आरक्षण के लाभ को लेकर बहस के बीच यह प्रस्ताव नई राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।
चिराग पासवान से भी जुड़ रहा है मुद्दा
संतोष सुमन के इस प्रस्ताव की तुलना चिराग पासवान की आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़ी राजनीति से भी की जा रही है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में दोनों नेताओं के रुख कई बार अलग दिखाई दिए हैं। ऐसे में आरक्षण के लाभ को गरीब और सबसे जरूरतमंद तबकों तक पहुंचाने का मुद्दा एनडीए के भीतर भी चर्चा का विषय बन सकता है।
बिहार की राजनीति में क्यों अहम है यह प्रस्ताव?
बिहार में आरक्षण हमेशा से बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। चुनावी राजनीति में अलग-अलग सामाजिक समूहों की भागीदारी और सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में अवसर का सवाल सीधे तौर पर राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है। ऐसे में संतोष सुमन का ‘रोटेशन सिस्टम’ वाला सुझाव आने वाले समय में सामाजिक न्याय की बहस का हिस्सा बन सकता है।
हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की जरूरत होगी। केवल राजनीतिक प्रस्ताव से आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में तत्काल बदलाव संभव नहीं है।
संतोष सुमन के प्रस्ताव का मूल तर्क यही है कि आरक्षण का उद्देश्य केवल आरक्षित वर्ग की पहचान तक सीमित न रहे, बल्कि उसके भीतर जो समूह सबसे ज्यादा पिछड़े हैं, उन्हें भी पर्याप्त अवसर मिले। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके इस ‘न्यू आइडिया’ पर बिहार की राजनीति में दूसरे दल और नेता क्या प्रतिक्रिया देते हैं।