मायावती का बड़ा सियासी फैसला, सुखबीर बादल को झटका; पंजाब में अकेले चुनाव लड़ेगी BSP

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चंडीगढ़, 02 सितंबर2026 । पंजाब की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन का गणित तेजी से बदल रहा है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने पंजाब विधानसभा चुनाव में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करने और पार्टी के दम पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। इस फैसले से शिरोमणि अकाली दल और BSP के बीच बना पुराना राजनीतिक समीकरण फिलहाल टूटता नजर आ रहा है।

दोनों दलों ने मिलकर लड़ा था चुनाव

2022 में SAD और BSP अलायंस पार्टनर थे, जब बीएसपी ने 117 असेंबली सीटों में से 20 पर चुनाव लड़ा था। दोआबा में आठ, मालवा में सात और माझा में पांच। बीएसपी सिर्फ एक सीट नवांशहर से जीत पाई थी। पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां पर दलित आबादी का लगभग 32 परसेंट हैं। जो भारत में सबसे ज्यादा है। पंजाब में बीएसपी 1992 की तरह दलित या बहुजन वोटरों का दिल नहीं जीत पाई है। 1992 में 16.32 परसेंट वोट शेयर से बीएसपी 2017 में 1.52 परसेंट पर आ गई। 2022 में नवांशहर सीट जीतने पर सिर्फ 0.25 परसेंट का सुधार कर पाई।

मायावती ने पार्टी की पंजाब इकाई के वरिष्ठ नेताओं के साथ समीक्षा बैठक के दौरान चुनावी रणनीति पर चर्चा की। पार्टी की ओर से कहा गया कि पिछले गठबंधनों से BSP को सीटों और वोट प्रतिशत के स्तर पर अपेक्षित फायदा नहीं मिला। इसी वजह से पार्टी अब अपने संगठन और वोट बैंक को मजबूत करते हुए अपने दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति अपना रही है।

सुखबीर बादल के लिए क्यों बड़ा झटका?

BSP और शिरोमणि अकाली दल का पंजाब में पुराना राजनीतिक संबंध रहा है। दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन किया था। उस चुनाव में BSP ने 117 में से 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जबकि अकाली दल ने 97 सीटों पर चुनाव लड़ा था। BSP को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी।

अब BSP के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से अकाली दल को खासतौर पर दलित मतदाताओं के बीच अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 32 फीसदी है, जो देश के राज्यों में सबसे अधिक हिस्सेदारी में से एक है। हालांकि BSP का मौजूदा वोट शेयर पहले के मुकाबले काफी कम हो चुका है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसका प्रभाव अभी भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

दोआबा क्षेत्र पर खास नजर

BSP का प्रभाव पंजाब के दोआबा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। पार्टी ने जालंधर, नवांशहर, होशियारपुर और आसपास के इलाकों में अपने संगठन को सक्रिय करने की कोशिश की है। ऐसे में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला इन क्षेत्रों में अकाली दल के साथ-साथ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और BJP के चुनावी समीकरण पर भी असर डाल सकता है।

BSP ने पंजाब में अपने संगठन को फिर से मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर अभियान चलाने की तैयारी भी की है। पार्टी का लक्ष्य बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और 117 विधानसभा क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना है। इससे साफ है कि मायावती का फैसला केवल गठबंधन से दूरी बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी अपने स्वतंत्र राजनीतिक आधार को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है।

पंजाब में गठबंधन की राजनीति और दिलचस्प हुई

BSP के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान से पंजाब में विपक्षी खेमे का समीकरण और जटिल हो गया है। BJP ने भी राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का दावा किया है, जबकि अकाली दल के साथ उसके संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं जारी हैं। ऐसे में 2027 का चुनाव कई दलों के बीच बहुकोणीय मुकाबले का रूप ले सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि BSP अकेले मैदान में उतरकर अपना पुराना जनाधार कितना वापस हासिल कर पाती है। वहीं अकाली दल के सामने चुनौती यह होगी कि BSP के अलग होने के बाद दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को किस तरह मजबूत किया जाए। चुनाव से पहले होने वाले नए गठबंधन और राजनीतिक समीकरण इस तस्वीर को आगे और बदल सकते हैं।

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