नई दिल्ली, 04 जुलाई 2026 । सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की निजी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के Comptroller and Auditor General of India द्वारा प्रस्तावित ऑडिट पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह मामला कथित तौर पर लगभग 38,500 करोड़ रुपये के वित्तीय विवाद और बिजली क्षेत्र में नियामकीय प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है।
सिंघवी हैं कंपनियों के वकील
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एस. चंद्रशेखर की अवकाशकालीन पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और निजी बिजली वितरण कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों पर विचार किया। इसके बाद अदालत ने दिल्ली सरकार के ऑडिट संबंधी आदेश पर फिलहाल रोक लगाने का निर्णय लिया।
ऑडिट प्रक्रिया फिलहाल रुकी
गौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने गुरुवार को राजधानी की तीन निजी बिजली वितरण कंपनियों के कामकाज और वित्तीय मामलों की जांच के लिए CAG ऑडिट का आदेश दिया था। सरकार का कहना था कि वर्षों से उपभोक्ताओं से वसूले जाने वाले करीब 38,500 करोड़ रुपये के रेगुलेटरी एसेट्स लंबित हैं, इसलिए गहन जांच जरूरी है। सरकार के आदेश के अनुसार, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) को यह जांच करनी थी कि आखिर किन परिस्थितियों में बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड (BRPL), बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (BYPL) और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL) ने रेगुलेटरी एसेट्स की राशि की वसूली किए बिना अपना संचालन जारी रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल CAG ऑडिट की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकेगी। अदालत के इस फैसले से निजी बिजली वितरण कंपनियों को अस्थायी राहत मिली है।
विवाद का केंद्र यह है कि क्या निजी बिजली वितरण कंपनियों के खातों का ऑडिट CAG द्वारा किया जा सकता है या नहीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि निजी कंपनियों पर CAG ऑडिट लागू करने के कानूनी दायरे और अधिकारों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। वहीं, दूसरी ओर सार्वजनिक हित और बिजली उपभोक्ताओं से जुड़े वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की आवश्यकता का भी पक्ष रखा गया है।
इस मामले का असर दिल्ली के बिजली क्षेत्र, नियामकीय ढांचे और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से जुड़े भविष्य के मामलों पर पड़ सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद CAG ऑडिट की प्रक्रिया स्थगित रहेगी और अगली सुनवाई में अदालत इस विवाद के कानूनी पहलुओं पर विस्तार से विचार करेगी।