देहरादून, 26 जून् 2026 । निहंग सिख, सिख धर्म के सबसे प्राचीन और वीर योद्धा संप्रदायों में से एक माने जाते हैं। इन्हें “अकाल सेना” या “गुरु की लाडली फौज” भी कहा जाता है। इनकी स्थापना का श्रेय दसवें सिख गुरु, Guru Gobind Singh को दिया जाता है, जिन्होंने धर्म, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। निहंग सिख अपने विशिष्ट नीले वस्त्र, ऊंची पगड़ी, पारंपरिक शस्त्र और अनुशासित जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं।
इस घटना में कुछ लोग घायल हो गए। जिसके बाद चार निहंग गिरफ्तार किए गए। इसको लेकर निहंग नाराज हैं। इसके बाद निहंगों ने चार दिन तक रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू में गुरुद्वारे पर कब्जा किया। अब पंजाब से आए निहंग हेमकुंट साहिब को जाना जाते हैं। जिनको हिमाचल सीमा पर रोका गया है। इस प्रकरण के बाद निहंग सिख चर्चाओं में है।
निहंग सिखों की पहचान उनके पारंपरिक पहनावे और शस्त्र धारण करने की परंपरा से होती है। वे कृपाण, भाला, तलवार, चक्र जैसे पारंपरिक हथियार धारण करते हैं और आज भी गुरु परंपरा के अनुसार शस्त्र विद्या का अभ्यास करते हैं। धार्मिक आयोजनों और गुरुद्वारों में उनकी विशेष भूमिका देखने को मिलती है।
क्यों कहलाते हैं ‘गुरु की लाडली फौज’?
इतिहास के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह ने निहंगों को धर्म और कमजोरों की रक्षा का दायित्व सौंपा था। मुगल शासन और अन्य आक्रमणों के दौरान निहंग सिखों ने अनेक युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी वीरता, अनुशासन और बलिदान की भावना के कारण उन्हें “गुरु की लाडली फौज” कहा जाता है।
उत्तराखंड से क्या है खास कनेक्शन?
उत्तराखंड का निहंग सिखों से गहरा धार्मिक संबंध है। राज्य में स्थित Hemkund Sahib सिखों के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है, जहां हर वर्ष बड़ी संख्या में निहंग श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा चारधाम और हेमकुंड साहिब यात्रा मार्ग पर कई गुरुद्वारों में निहंग सिख सेवा और धार्मिक गतिविधियों में भी भाग लेते हैं। इसी कारण उत्तराखंड और निहंग परंपरा के बीच विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक जुड़ाव माना जाता है।
हाल के दिनों में उत्तराखंड में निहंग सिखों से जुड़े कुछ घटनाक्रमों के कारण यह समुदाय चर्चा में आया है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विवाद को पूरे समुदाय से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। निहंग परंपरा का मूल उद्देश्य धर्म की रक्षा, सेवा, साहस और मानवता की भावना को आगे बढ़ाना है।