पटना, 23 अक्टूबर 2026 | बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनावों के साथ-साथ विधान परिषद यानी MLC चुनाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बनने के लिए विधायक (MLA) होना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत कोई व्यक्ति विधान परिषद का सदस्य (MLC) रहते हुए भी मुख्यमंत्री बन सकता है। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में विधान परिषद की सदस्यता का अपना अलग महत्व रहा है।
1967 का चुनाव और बीपी मंडल
बीपी मंडल 1 फरवरी 1968 को बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। वे जिन परिस्थितियों में MLC और फिर मुख्यमंत्री बने, वह दल-बदल, जोड़-तोड़ और अवसरवादी राजनीति की पराकाष्ठा है। 1967 में वे मधेपुरा से संसोपा के टिकट सांसद चुने गये थे। 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार गैर कांग्रेसी दलों की मिली जुली सरकार बनी। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। जब महामाया सरकार का गठन होने लगा तो सांसद बीपी मंडल ने भी राज्य सरकार में मंत्री बनने की जिद पकड़ ली। संसोपा के शीर्ष नेता राम मनोहर लोहिया ने उन्हें समझाया कि एक सांसद के राज्य सरकार में मंत्री बनने से जनता में गलत संदेश जाएगा। हमें दिखाना होगा कि हम राजनीतिक मूल्यों में कांग्रेस से अलग हैं।
MLA और MLC में क्या अंतर है?
MLA यानी विधानसभा सदस्य जनता द्वारा विधानसभा क्षेत्र से चुना जाता है। वहीं, MLC यानी विधान परिषद सदस्य बनने के अलग-अलग तरीके हैं। बिहार जैसे द्विसदनीय विधानमंडल वाले राज्यों में विधानसभा के साथ विधान परिषद भी होती है।
संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, यदि कोई मंत्री नियुक्ति के समय राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। यह नियम मुख्यमंत्री पर भी लागू होता है।
बिहार के राजनीतिक इतिहास में ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने विधानसभा के बजाय विधान परिषद के माध्यम से विधानमंडल में अपनी सदस्यता बनाए रखी। इससे स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री पद के लिए MLA होना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते संवैधानिक शर्तें पूरी हों।
हालांकि, ऐसे मुख्यमंत्रियों की संख्या और उनके नामों की पुष्टि करते समय यह अंतर समझना जरूरी है कि कौन मुख्यमंत्री रहते हुए MLC थे और कौन मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर किसी सदन के सदस्य बने।
MLC चुनाव का राजनीतिक महत्व
विधान परिषद के चुनाव राजनीतिक दलों के लिए अहम होते हैं। इन चुनावों के जरिए दल सदन में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करते हैं। परिषद में संख्या बल का असर विधायी चर्चा, विधेयकों और राजनीतिक रणनीति पर पड़ सकता है।
बिहार में MLC चुनाव इसलिए भी चर्चा में रहते हैं क्योंकि राज्य की राजनीति में कई प्रमुख नेता विधान परिषद के सदस्य रहे हैं। ऐसे चुनावों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की नजर रहती है।
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। मुख्यमंत्री को विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक सदन का सदस्य होना चाहिए। यदि नियुक्ति के समय वह किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो संविधान के अनुसार छह महीने के भीतर सदस्य बनना आवश्यक है।