हिमंत बिस्वा सरमा का बयान—‘₹1 लाख भी दूं तो मुस्लिम वोट नहीं देंगे’: चुनावी रणनीति

0

असम , 12 दिसंबर 2025 । असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक विवादित बयान देते हुए कहा कि “₹1 लाख भी दूं तो मुस्लिम वोट नहीं देंगे।” यह बयान राजनीतिक गलियारों में तेज़ बहस का विषय बन गया है। सरमा के इस वक्तव्य को उनकी चुनावी रणनीति, राज्य की सामाजिक संरचना और भाजपा की वोटबैंक पॉलिटिक्स से जोड़कर देखा जा रहा है।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गुरुवार कहा है कि असम में वोट योजनाओं या पैसों से नहीं, बल्कि विचारधारा और सोच से तय होते हैं। उन्होंने कहा- चाहे वे 10 हजार रुपए दें या 1 लाख, मुस्लिम वोटर उन्हें वोट नहीं देंगे।

सरमा दिल्ली में एक निजी मीडिया संस्थान के कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस दौरान उनसे पूछा गया था कि क्या उनके पास बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह कोई योजना है, जिसमें महिलाओं को सीधे पैसे दिए जाते हैं, जैसे महिला रोजगार योजना में 21 लाख महिलाओं को 10,000 रुपए मिलते हैं।

सरमा ने उदाहरण देते हुए कहा- एक मुस्लिम वोटर ने मेरे काम की तारीफ की। जिन्हें हम मियां मुसलमान कहते हैं। उसने कहा कि जरूरत पड़ी तो किडनी भी दे देगा, लेकिन वोट नहीं देगा।

CM सरमा की 3 बड़ी बाते…

  • असम में अवैध आबादी बढ़ रही है और मुस्लिम लोग बढ़ रहे हैं, जो राज्य के लिए समस्या है। 2021 में मुस्लिम आबादी 38% थी और 2027 में यह 40% तक पहुँच सकती है।
  • 1961 से मुस्लिम आबादी हर दस साल में 4–5% बढ़ रही है। अगर यह 50% से ज्यादा हो गई, तो बाकी लोग मुश्किल में पड़ सकते हैं। इससे असम की पहचान खतरे में है।
  • मियां मुसलमान और मुस्लिम महिलाएं हमसे अच्छे संबंध रखते हैं, लेकिन हमें वोट नहीं देंगे। अगर मुस्लिम वोटर सारे वोट कांग्रेस को भी दें, तो भी हमारी सरकार जीत जाएगी।

विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान दो तरह के संदेश देता है—पहला, भाजपा के पारंपरिक समर्थन आधार को और मजबूत करना; दूसरा, विपक्ष पर यह आरोप लगाना कि एक वर्ग विशेष उनके पक्ष में नहीं आता, चाहे विकास योजनाएं कितनी भी क्यों न दी जाएं। सरमा पिछले कुछ वर्षों से लगातार ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की लाइन को मजबूत करने वाले नेता माने जाते हैं, और उनका यह बयान उसी राजनीतिक शैली का विस्तार माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर इस टिप्पणी की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोग इसे बेबाक राजनीतिक सच्चाई मान रहे हैं, जबकि कई इसे समाज को बांटने वाली बयानबाजी के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान आगामी चुनावों से पहले माहौल को प्रभावित कर सकता है और सत्तापक्ष व विपक्ष दोनों की रणनीतियों पर इसका असर पड़ सकता है।

बयान के बीच, यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के वक्तव्य क्षेत्रीय सद्भाव और राजनीतिक संवाद को प्रभावित कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने इसे आचार संहिता के विपरीत बताते हुए आलोचना की है, जबकि भाजपा इसे एक नेता की व्यक्तिगत राय बताकर बचाव कर रही है।
कुल मिलाकर, यह बयान केवल विवाद नहीं, बल्कि वर्तमान भारतीय राजनीति की बदलती शब्दावली और चुनावी संदेशों का एक बड़ा उदाहरण बन गया है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.