CJI बोले-न्याय की सक्रियता जरूरी लेकिन यह आतंक न बने

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नई दिल्ली, 18 नवम्बर 2025 । भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका की सक्रियता (Judicial Activism) लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी सीमाओं का ध्यान न रखा जाए तो यह व्यवस्था के लिए ‘आतंक’ का रूप भी ले सकती है। उनके इस बयान ने न्यायिक दायित्व, संतुलन और संस्थागत मर्यादा पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

CJI ने कहा कि अदालतों की सक्रियता का उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना, प्रशासनिक खामियों को सुधारना और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत बनाना है। लेकिन जब न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बहुत आगे चली जाती है, तब यह दूसरे अंगों—कार्यपालिका और विधायिका—के क्षेत्र में दखल देने जैसा बन जाता है, जो लंबे समय में संस्थागत असंतुलन उत्पन्न कर सकता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर पूरी संवेदनशीलता के साथ हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन यह हस्तक्षेप ‘उचित सीमाओं’ के भीतर रहना चाहिए। CJI के अनुसार, न्याय की सक्रियता तभी सार्थक है जब उसका उद्देश्य न्याय हासिल करना हो, न कि व्यवस्था पर दबाव बनाना या किसी एजेंडा की ओर बढ़ना।

उन्होंने यह भी कहा कि “कोर्ट्स का काम प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासन कानून के दायरे में और संविधान के अनुरूप चले।” कई मामलों में पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन (PIL) के दुरुपयोग, न्यायिक आदेशों की अत्यधिक विस्तारवादी व्याख्या और ‘जनहित’ के नाम पर कोर्ट के सामने आने वाली मनमानी मांगों का जिक्र करते हुए CJI ने कहा कि न्यायपालिका को इससे सतर्क रहना होगा।

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां अदालतों ने सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई, जिसे जनता ने सराहा, लेकिन कुछ बार फैसलों पर यह भी सवाल उठा कि कहीं यह न्यायिक ओवररीच तो नहीं। CJI की टिप्पणी इसी सन्दर्भ में एक संतुलित दृष्टिकोण की ओर संकेत करती है—जहां न्यायपालिका जनता की आवाज बनी रहे, लेकिन ‘अधिकारों के विस्तार’ की होड़ में अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर न करे।

उन्होंने अंत में यह भी कहा कि लोकतंत्र में सभी संवैधानिक संस्थाओं के बीच ‘सम्मानजनक दूरी’ और आपसी तालमेल आवश्यक है। न्यायपालिका की शक्ति जनता के भरोसे से आती है, और इस भरोसे को बनाए रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

CJI के इस बयान ने कानूनविदों, राजनीतिक वर्ग और नागरिक समाज के बीच एक विवेकपूर्ण चर्चा की शुरुआत कर दी है कि आखिर न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण की सीमा कहां तय की जानी चाहिए।

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