कभी किसी धमाके, किसी हादसे या किसी अनजाने डर की आवाज़ उस उम्मीद को तोड़ देती है। सड़कें खामोश हो जाती हैं, और एक पूरा शहर उस आवाज़ में अपने किसी को खो देता है।
कोई माँ दीवार की तरफ देखती रह जाती है, कोई पत्नी हर बजती कॉल पर उम्मीद करती है कि शायद उसकी रिंगटोन पर वही होगा।
कोई बच्चा दरवाज़े की ओर भागता है — “पापा आ गए क्या?” — लेकिन वहाँ सिर्फ़ ख़ामोशी होती है।
टीवी स्क्रीन पर न्यूज़ टिकर चलता रहता है — “घटना में इतने मारे गए…” — पर इन आँकड़ों के पीछे जो चेहरे हैं, जो घरों की दीवारों से लिपटी सिसकियाँ हैं, उन्हें कोई कैमरा नहीं दिखाता।
कोई रिपोर्टर उस खामोश कमरे में नहीं जाता जहाँ अब सिर्फ़ तस्वीरें बात करती हैं।
हर हादसे के बाद कुछ सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं —
क्या हमारी सुरक्षा सिर्फ़ रिपोर्टों में है?
क्या किसी इंसान की ज़िंदगी अब सिर्फ़ एक हेडलाइन भर है?
क्यों हर खबर के साथ संवेदना इतनी जल्दी मर जाती है?
हर विस्फोट, हर त्रासदी सिर्फ़ पत्थर और दीवारें नहीं तोड़ती — वह भरोसे की नींव हिला देती है। उस भरोसे की, जिसके सहारे हम हर सुबह घर से निकलते हैं।
शायद अब वक्त है कि हम सोचें — इंसानियत कब जागेगी?
ताकि कोई माँ, कोई बच्चा, किसी शाम यूँ बेसब्री से दरवाज़े की ओर न देखे…
और कोई लौटकर आने वाला — सच में लौट आए।