कीव,21 अक्टूबर 202 | रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच यूक्रेन की सेना ने एक ऐसा बचाव अभियान चलाने का दावा किया है, जिसने युद्ध के मैदान में घायल सैनिकों को सुरक्षित निकालने के तरीकों पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यूक्रेनी सेना के मुताबिक, भारी वजन उठाने वाले ड्रोन की मदद से एक घायल सैनिक को खतरनाक फ्रंटलाइन से सुरक्षित बाहर निकाला गया। सेना ने इस अभियान को अपनी तरह का दुनिया का पहला ऑपरेशन बताया है।
इस रेस्क्यू की खास बात यह रही कि जिस इलाके में सैनिक घायल अवस्था में फंसा था, वहां बारूदी सुरंगों और रूसी ड्रोनों की मौजूदगी के कारण जमीन के रास्ते पहुंचना बेहद जोखिम भरा था। ऐसे में पारंपरिक बचाव साधनों के बजाय भारी क्षमता वाले ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। इस अभियान का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें सैनिक को ड्रोन के सहारे हवा में ले जाते हुए देखा जा सकता है।
रूसी हमले में दोस्त मारा गया, खुद घायल हुए
कोस्त्यांतिन व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क मोर्चे पर तैनात थे। वहां रूसी सेना के हमलों का खतरा लगातार बना रहता था। व्लासेंको और उनका एक साथी कंक्रीट के नाली के पाइप में बने ठिकाने पर रहते थे।
दोनों साथ मिलकर मोर्चा संभाल रहे थे। इसी साल 14 फरवरी को रूसी सेना के ड्रोन हमले में व्लासेंको के साथी की मौत हो गई। विस्फोटक के छर्रों से व्लासेंको भी घायल हुए। उनके दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए।
व्लासेंको को तुरंत इलाज की जरूरत थी, लेकिन उस जगह तक डॉक्टरों का पहुंचना बेहद मुश्किल था। चोट इतनी गंभीर थी कि उनके दाहिने पैर में गैंगरीन फैल गया।
कैसे हुआ घायल सैनिक का रेस्क्यू?
रिपोर्टों के अनुसार, इस अभियान में यूक्रेन में निर्मित भारी क्षमता वाले हेक्साकॉप्टर ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। यह ड्रोन गुरज़ुफ डिफेंस कंपनी ने बनाया है। बचाव अभियान के लिए इसकी व्यवस्था में बदलाव किए गए, ताकि घायल व्यक्ति को हवा में ले जाते समय ड्रोन का संतुलन बना रहे और उसके अनियंत्रित रूप से झूलने या पलटने का जोखिम कम हो।
सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि ड्रोन जमीन पर उतरता है। इसके बाद घायल सैनिक खुद को सुरक्षा हार्नेस की मदद से ड्रोन के नीचे बांधता है। फिर ड्रोन उसे हवा में उठाकर सुरक्षित क्षेत्र की ओर ले जाता है। वहां पहुंचने पर सैनिक को सावधानी से नीचे उतारा जाता है, जिसके बाद उसके साथियों ने आगे के उपचार की व्यवस्था की।
यूक्रेनी सेना के मुताबिक, बचाव अभियान सफल रहा और सैनिक की जान को अब खतरा नहीं है। वह उपचार और पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजर रहा है। हालांकि, सुरक्षा कारणों से अभियान की सटीक लोकेशन सार्वजनिक नहीं की गई।
क्या भविष्य में ड्रोन बनेंगे उड़ती हुई एंबुलेंस?
इस घटना के बाद युद्ध क्षेत्र में ड्रोन आधारित मेडिकल निकासी की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो सकती है। ऐसे ड्रोन उन इलाकों में उपयोगी साबित हो सकते हैं, जहां सड़कें क्षतिग्रस्त हों, सैन्य वाहन नहीं पहुंच सकते हों या बचाव दल के लिए आगे बढ़ना बहुत खतरनाक हो।
हालांकि, इस तकनीक की अपनी सीमाएं भी हैं। हवा में घायल व्यक्ति को ले जाना जोखिम भरा हो सकता है। मौसम, बैटरी, वजन उठाने की क्षमता, संचार व्यवस्था और दुश्मन के हमलों जैसे कारक अभियान की सफलता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे ड्रोन पारंपरिक मेडिकल हेलीकॉप्टर या एंबुलेंस का हर परिस्थिति में विकल्प नहीं बन सकते। फिलहाल इन्हें बेहद जोखिम भरी परिस्थितियों में एक अतिरिक्त बचाव विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
यूक्रेन का यह रेस्क्यू ऑपरेशन बताता है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका तेजी से बदल रही है। अब इनका उपयोग दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, सामान पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर घायल सैनिकों को सुरक्षित निकालने के लिए भी किया जा रहा है।
हालांकि, इसे दुनिया का पहला ऐसा अभियान बताने वाला दावा यूक्रेनी सेना का है और स्वतंत्र रूप से इसकी व्यापक ऐतिहासिक पुष्टि अलग से जरूरी है। इसके बावजूद, यह घटना युद्ध के मैदान में मानवरहित तकनीक के बढ़ते महत्व को उजागर करती है। आने वाले समय में ऐसी प्रणालियों का विकास सैनिकों की सुरक्षा और आपातकालीन बचाव अभियानों के लिए अहम साबित हो सकता है।