पटना,21 अक्टूबर 2026 | बिहार की राजनीति में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर चल रही बयानबाजी ने एक बार फिर हलचल बढ़ा दी है। पार्टी से निष्कासित पूर्व नेता छोटू सिंह ने जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि संजय झा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को राजनीतिक रूप से स्थिर नहीं रहने देना चाहते और उनकी छवि खराब करवा रहे हैं। छोटू सिंह के इन बयानों के बाद बिहार में एनडीए की अंदरूनी राजनीति और जदयू के नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, ये आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।
उमेश कुशवाहा की तो ऐसी पोल खोलेंगे: छोटू सिंह
छोटू सिंह ने कहा कि ‘जबसे नीतीश जी को चार पांच लोग जिसकी कोई हैसियत नहीं हैं। एक प्रदेश अध्यक्ष हैं उमेश कुशवाहा जी, जो लोगों को निकालते हैं। उनसे पूछिएगा कि नीतीश जी से पहले किसके दरवाजा पर सब्जी लेकर बैठते थे? किसी को भी बिना कारण बताए पार्टी से निकाल देते हैं। इनका तो ऐसा पोल खोलेंगे, ऐसा वीडियो खोलेंगे कि कहीं के नहीं रहेंगे। इनको तो हमलोगों ने चुनाव में जीत दिलवाई थी। अपने वोटरों को एकजुट कर वोट दिलवाया था। ये चार पांच लोग नीतीश कुमार और निशांत कुमार को खत्म करना चाहते हैं।’
संजय झा पर क्यों लगाए गए आरोप?
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, छोटू सिंह ने आरोप लगाया कि संजय झा केंद्र सरकार में मंत्री बनना चाहते हैं और इसके लिए जदयू कोटे से केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि संजय झा और उनके करीबी नेता मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मजबूत स्थिति में नहीं देखना चाहते।
छोटू सिंह ने सम्राट चौधरी की तारीफ करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ नेताओं की वजह से उनकी छवि प्रभावित हो रही है। हालांकि, संजय झा की कथित भूमिका और मुख्यमंत्री को पद से हटाने की किसी योजना के समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण इन रिपोर्टों में सामने नहीं आया है।
कौन हैं छोटू सिंह और जदयू से क्यों हुआ विवाद?
छोटू सिंह जदयू के पूर्व प्रदेश महासचिव रह चुके हैं। रिपोर्टों के अनुसार, जुलाई 2026 में पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था। पार्टी की ओर से कार्रवाई के पीछे अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों का हवाला दिया गया था। इसके बाद से छोटू सिंह पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बयान देते रहे हैं।
उन्होंने जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा समेत कुछ अन्य नेताओं पर भी निशाना साधा है। छोटू सिंह का कहना है कि पार्टी के कुछ नेता नीतीश कुमार और उनके परिवार की राजनीतिक स्थिति को कमजोर करना चाहते हैं। इन बयानों को पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष के संदर्भ में देखा जा रहा है।
ललन सिंह की जगह केंद्रीय मंत्री बनने की चर्चा
छोटू सिंह ने अपने बयान में संजय झा की केंद्रीय राजनीति में भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि संजय झा केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाने के इच्छुक हैं और ललन सिंह की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल यह छोटू सिंह का आरोप है; इसे किसी तय राजनीतिक बदलाव या आधिकारिक योजना के रूप में नहीं देखा जा सकता।
इस बयान ने जदयू के नेताओं के बीच कथित खींचतान को चर्चा में ला दिया है। हालांकि, केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव या संजय झा की संभावित भूमिका को लेकर किसी आधिकारिक घोषणा का उल्लेख संबंधित रिपोर्टों में नहीं है।
सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार के रिश्ते भी चर्चा में
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में भाजपा और जदयू के संबंधों को लेकर राजनीतिक विश्लेषण जारी है। सितंबर 2026 में सम्राट चौधरी ने कहा था कि नीतीश कुमार ने अपनी इच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ा था और भाजपा ने उन पर पद छोड़ने का दबाव नहीं बनाया था। उन्होंने नीतीश कुमार को एनडीए का निर्विवाद नेता भी बताया था।
ऐसे में छोटू सिंह के ताजा आरोपों ने नेतृत्व और सत्ता-संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। लेकिन बयानबाजी और वास्तविक राजनीतिक निर्णय के बीच अंतर करना जरूरी है। मुख्यमंत्री को हटाने की कोई योजना है या नहीं, इस पर केवल आरोपों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
जदयू की अंदरूनी राजनीति पर क्यों टिकी नजरें?
जदयू में संगठनात्मक नियुक्तियों, प्रदेश नेतृत्व और नेताओं के बीच असंतोष को लेकर हाल के दिनों में बयान सामने आए हैं। ऐसे माहौल में छोटू सिंह के आरोप पार्टी की आंतरिक राजनीति को फिर चर्चा में ले आए हैं। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि छोटू सिंह ने संजय झा पर सम्राट चौधरी की छवि प्रभावित करने और केंद्रीय मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने के आरोप लगाए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।