बिहार MLC चुनाव में सवर्ण समीकरण साधने की कोशिश,

8 में से 5 टिकट देकर सम्राट चौधरी सरकार ने दिया बड़ा संदेश

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नई दिल्ली, 08 अक्टूबर 2026 ।  बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। अब विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर भी सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश तेज दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की ओर से आठ में से पांच सीटों पर सवर्ण वर्ग से जुड़े उम्मीदवारों को मैदान में उतारे जाने को इसी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

ताजा राजनीतिक चर्चा में इसे सवर्ण वर्ग के बीच सामने आ रही नाराजगी को कम करने की कोशिश के रूप में पेश किया जा रहा है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस फैसले का चुनावी असर कितना पड़ेगा।

डैमेज कंट्रोल में जुटा एनडीए

बांकीपुर सिंड्रोम ने एनडीए के होश ठिकाने लगा दिए। इसका प्रभाव देख ले कि एमएलसी के आठ सीटों पर उम्मीदवार देने की बारी आई तो सभी आठ सीटों में पांच सवर्ण उम्मीदवार को एनडीए नेतृत्व ने चुनावी जंग में उतार कर सवर्णों की नाराजगी को कम करने का प्रयास किया। जनता दल यू ने तो पटना स्नातक सीट से नीरज कुमार, तिरहुत स्नातक सीट से अभिषेक झा को, सारण शिक्षक सीट से आनंद पुष्कर को चुनावी जंग में उतारा।

8 सीटों में 5 सवर्ण उम्मीदवारों पर दांव

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए चुनाव होना है। इनमें चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। चुनाव के लिए मतदान 23 अक्टूबर को होगा, जबकि मतगणना 27 अक्टूबर को निर्धारित है।

एनडीए की ओर से उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक समीकरण पर भी ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, आठ में से पांच प्रत्याशी सवर्ण समुदाय से हैं। इसे सामान्य वर्ग के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सवर्ण वर्ग की नाराजगी क्यों चर्चा में?

बिहार में सवर्ण समुदाय के एक हिस्से की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लोगों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दलों पर दबाव बनता रहा है।

ताजा रिपोर्ट में सवर्ण वर्ग की शिकायतों में उपेक्षा, आर्थिक कमजोरी के बावजूद पर्याप्त सहायता नहीं मिलने और राजनीतिक पहचान से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में एमएलसी उम्मीदवारों के चयन को इस वर्ग तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

EWS और सवर्ण आयोग का मुद्दा भी महत्वपूर्ण

सवर्ण वर्ग से जुड़े मुद्दों में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग यानी EWS की स्थिति भी लगातार चर्चा में रही है। बिहार में सवर्ण आयोग से जुड़े मुद्दे भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, राज्य सरकार ने सवर्ण वर्ग की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को लेकर आयोग के माध्यम से सुझाव जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। ऐसे में MLC टिकट वितरण और EWS से जुड़े मुद्दों को अलग-अलग नहीं देखा जा रहा है।

इन आठ सीटों का चुनाव एनडीए के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गठबंधन के भीतर कुछ सीटों पर मतभेद सामने आए हैं। पटना स्नातक सीट पर जेडीयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार को पार्टी विधायक अनंत सिंह के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अनंत सिंह ने जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह के समर्थन की बात कही है।

इसी मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास पर एनडीए नेताओं की बैठक भी हुई। बैठक में गठबंधन की एकजुटता बनाए रखने और उम्मीदवारों को लेकर चल रहे विवादों को सुलझाने पर चर्चा हुई।

आठ में से पांच सवर्ण प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने से एनडीए की रणनीति का एक पहलू साफ दिखाई देता है। पार्टी और गठबंधन के सामने अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।

सवर्ण वर्ग को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश देना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, चुनावी नतीजे आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि उम्मीदवार चयन का असर मतदाताओं और संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के समीकरण पर कितना पड़ा।

MLC चुनाव से आगे की राजनीति पर भी नजर

बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव का महत्व केवल आठ सीटों तक सीमित नहीं है। यह चुनाव एनडीए के अंदर तालमेल, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और अलग-अलग सामाजिक समूहों के साथ गठबंधन की रणनीति की परीक्षा भी है।

इसके साथ ही जन सुराज, आरजेडी और अन्य विपक्षी दलों की सक्रियता ने मुकाबले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। ऐसे में सम्राट चौधरी सरकार के लिए सामाजिक समीकरण के साथ-साथ गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है।

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