यूपी चुनाव 2027: वेस्ट यूपी में अखिलेश के PDA के ‘D’ पर चंद्रशेखर की नजर
मेरठ , 19 सितंबर 2026 । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी यूपी में दलित मतदाताओं को लेकर सियासी गतिविधियां तेज होती दिख रही हैं। एक तरफ समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद दलित राजनीति के स्वतंत्र आधार को विस्तार देने में जुटे हैं। ऐसे में वेस्ट यूपी में PDA के ‘D’ यानी दलित हिस्से को लेकर दोनों नेताओं की राजनीतिक रणनीतियां चर्चा में हैं।
चंद्रशेखर क्या सपा की पीडीए रणनीति के लिए चुनौती?
सियासी जानकार रिटायर्ड असिस्टेंड कमिश्नर सहकारिता एमबी जैदी का मानना है कि चंद्रशेखर सपा के पीडीए (PDA) फॉर्मूले की सबसे बड़ी अड़चन साबित होगे, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि PDA के ‘D’ यानी दलित हिस्से पर चंद्रशेखर की राजनीति का असर 2027 के समीकरण में महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि नगीना लोकसभा सीट की जीत ने उन्हें एक मजबूत राजनीतिक आधार दिया है। अब चंद्रशेखर के सामने चुनौती उस आधार को पूरे यूपी में फैलाने की है।
अखिलेश यादव की PDA रणनीति में ‘D’ पर जोर
सपा की PDA रणनीति में दलित एक अहम हिस्सा हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी 2027 के चुनाव से पहले अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के साथ गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है।
पश्चिमी यूपी को इस रणनीति के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, सपा कुछ सीटों पर 2024 लोकसभा चुनाव में बने सामाजिक समीकरण को आगे बढ़ाने और दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
चंद्रशेखर के लिए नगीना बना राजनीतिक आधार
2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक स्वतंत्र दलित नेता के तौर पर चुनावी आधार दिया। अब उनकी पार्टी आजाद समाज पार्टी पश्चिमी यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों में संगठन विस्तार पर काम कर रही है।
जुलाई 2026 में आसपा ने यूपी की 45 विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों/प्रभारियों की घोषणा की थी। इसमें पश्चिमी यूपी के शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ और अन्य क्षेत्रों की सीटें भी शामिल थीं।
इससे संकेत मिलता है कि चंद्रशेखर की पार्टी केवल एक सीट या एक क्षेत्र तक सीमित रहने के बजाय विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठनात्मक मौजूदगी बनाने की तैयारी कर रही है।
पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर आजाद के संभावित विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। मई 2026 की एक रिपोर्ट में उनके मेरठ की हस्तिनापुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की संभावना का उल्लेख किया गया था। हालांकि, इसे उस समय संभावित रणनीति के तौर पर ही रिपोर्ट किया गया था, आधिकारिक अंतिम घोषणा के रूप में नहीं।
यदि वह पश्चिमी यूपी में किसी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ते हैं, तो इससे क्षेत्र में उनकी पार्टी की चुनावी गतिविधियां और तेज हो सकती हैं।
क्या सपा और आसपा के बीच मुकाबला होगा?
पश्चिमी यूपी में सपा और आसपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों दल दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाना चाहते हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर दो नेताओं के बीच व्यक्तिगत मुकाबले के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी।
सियासी विश्लेषकों के हवाले से नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि चंद्रशेखर की राजनीति सपा के PDA के दलित हिस्से को प्रभावित कर सकती है। साथ ही यह भी सवाल है कि चंद्रशेखर अपने नगीना आधार को पूरे उत्तर प्रदेश में किस हद तक विस्तार दे पाते हैं।
अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद के बीच राजनीतिक समीकरण हमेशा केवल प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों के बीच राजनीतिक तालमेल की कोशिश हुई थी, लेकिन गठबंधन नहीं बन सका। 2025 में भी दोनों दलों के संभावित साथ आने को लेकर राजनीतिक चर्चाएं सामने आई थीं।
इसलिए 2027 तक दोनों दलों के बीच संबंध किस दिशा में जाते हैं, यह सीटों के बंटवारे, उम्मीदवार चयन और व्यापक विपक्षी गठजोड़ जैसे मुद्दों पर निर्भर करेगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी गठबंधन को तय मानना उचित नहीं होगा।
‘D’ की राजनीति में कई दावेदार
दलित वोट को लेकर मुकाबला केवल सपा और आसपा के बीच नहीं है। बीजेपी, कांग्रेस और बसपा भी इस सामाजिक वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में दलित प्रतिनिधित्व, संगठन और उम्मीदवारों को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां बढ़ रही हैं।
ऐसे में पश्चिमी यूपी में आने वाले महीनों में टिकट बंटवारे, नए राजनीतिक समीकरण और संभावित गठबंधनों से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।