बंदी सिखों की रिहाई के मुद्दे पर पंजाब में सियासी घमासान

AAP-अकाली से लेकर BJP तक की नजर पंथक वोट पर

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चंडीगढ़, 03 सितंबर2026 । पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बंदी सिखों की रिहाई और पैरोल का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की ओर से जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मामले को लेकर राज्यपाल को पत्र लिखे जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक हलचल तेज हुई है। हवारा के परिवार और समर्थकों ने उनकी बीमार मां से मुलाकात के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग की है।

सीेम मान ने राज्यपाल को लिखा था पत्र

मुख्यमंत्री मान ने इस मामले को लेकर राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखा और उनसे मुलाकात भी की। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साल की शुरुआत में AAP सरकार ने हवारा की पैरोल याचिका खारिज कर दी थी। अब सरकार के रुख में बदलाव को पंजाब की चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। हवारा के पुराने साथी जसवंत सिंह ने दावा किया है कि बेअंत सिंह हत्याकांड में दोषी परमजीत सिंह भ्योरा और जगतार सिंह तारा की पैरोल अर्जियों पर भी सरकार समर्थन देने पर विचार कर रही है। हालांकि इन दावों पर अंतिम फैसला संबंधित अधिकारियों और सरकार की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

हवारा की पैरोल ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

जगतार सिंह हवारा 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए थे और फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद हैं। पंजाब सरकार ने पहले उनकी पैरोल याचिका खारिज की थी, लेकिन अब मुख्यमंत्री भगवंत मान के स्तर पर मामला उठाए जाने से राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस बदलाव को पंजाब की चुनावी राजनीति और पंथक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अकाली दल भी पंथक एजेंडे पर सक्रिय

पंथक राजनीति की पारंपरिक पहचान रखने वाला शिरोमणि अकाली दल भी बंदी सिखों के मुद्दे पर सक्रिय है। पार्टी बलवंत सिंह राजोआना के मामले को प्रमुखता से उठा रही है। राजोआना बेअंत सिंह हत्याकांड में दोषी ठहराए गए हैं और लंबे समय से जेल में हैं। अकाली दल की सक्रियता को अपनी पुरानी पंथक राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

AAP के लिए पंथक राजनीति में जगह बनाने का मौका

आम आदमी पार्टी लंबे समय से पंजाब में सत्ता में है, लेकिन पंथक मुद्दों पर उसकी भूमिका को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही है। हवारा की पैरोल का मुद्दा उठाकर AAP सरकार अब खुद को मानवीय आधार और कानूनी प्रक्रिया से जोड़ते हुए इस संवेदनशील विषय पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि योग्य कैदियों के मामलों में कानून समान रूप से लागू होना चाहिए।

अकाली दल का पंथक वोट बैंक क्यों बिखरा?

पंजाब में लंबे समय तक पंथक वोट को अकाली दल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता रहा है। हालांकि पिछले एक दशक में बेअदबी के मामलों, बहबल कलां गोलीकांड और अकाली दल के भीतर हुए राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण इस आधार में कमजोरी आई है। अब पंथक वोट किसी एक पार्टी के साथ पूरी तरह जुड़ा हुआ नहीं माना जा रहा है।

अमृतपाल समर्थक राजनीति ने बढ़ाई चुनौती

पंथक राजनीति में अब नए राजनीतिक समूह भी सक्रिय हैं। वारिस पंजाब दे से जुड़े राजनीतिक प्रयासों और अमृतपाल सिंह के प्रभाव ने अकाली दल के सामने नई चुनौती खड़ी की है। इसके अलावा कांग्रेस और भाजपा भी पंजाब में अलग-अलग मुद्दों के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा केवल जेल में बंद कैदियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यापक पंथक राजनीति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

2027 चुनाव में कितना असर डालेगा मुद्दा?

पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव को देखते हुए आने वाले महीनों में बंदी सिखों की पैरोल, रिहाई, बेअदबी के मामले, धार्मिक संस्थाओं और सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे और जोर पकड़ सकते हैं। राजनीतिक दलों के लिए चुनौती यह होगी कि वे पंथक मतदाताओं की भावनाओं से जुड़ने के साथ-साथ अपने रुख को कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप भी प्रस्तुत करें।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पंथक वोट बैंक का भरोसा कौन जीत पाएगा। अकाली दल अपनी पारंपरिक जमीन वापस पाने की कोशिश में है, AAP सत्ता में रहते हुए इस मुद्दे पर नई जगह बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि नए सिख राजनीतिक समूह पुराने समीकरणों को चुनौती दे रहे हैं। यही वजह है कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

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