नैनीताल, 26 अगस्त 2026 । उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति से जुड़े एक मामले में होटल संचालक को राहत देते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मामले की फिर से सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के आदेश के बाद होटल संचालक को अपना पक्ष रखने का एक और अवसर मिलेगा।
मामला होटल से जुड़े पर्यावरणीय मानकों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से लगाए गए पर्यावरण क्षतिपूर्ति से संबंधित है। होटल संचालक ने बोर्ड की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि क्षतिपूर्ति निर्धारित करने से पहले उचित सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता इस मामले में पहले एनजीटी की प्रधान पीठ, नई दिल्ली पहुंचा। एनजीटी ने 17 अप्रैल 2025 को पूर्व में जारी नोटिस को निरस्त करते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोडर् को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन कर नया आदेश पारित करने के निर्देश दिए। इसके बाद बोडर् ने 27 मई 2025 को नया नोटिस जारी किया और होटल के जवाब के बाद 16 अक्टूबर 2025 को विवादित आदेश पारित किया। होटल की ओर से खंडपीठ में दलील दी गई कि उसने 20 जुलाई 2026 को व्यक्तिगत सुनवाई का अनुरोध किया था, लेकिन सुनवाई का अवसर दिए बिना ही आदेश पारित कर दिया गया। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि वह होटल संचालक को उचित अवसर देकर मामले की पुनः सुनवाई करे और कानून के अनुसार नया आदेश पारित करे।
अदालत के निर्देश के बाद बोर्ड को मामले के तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेजों और होटल संचालक की दलीलों पर दोबारा विचार करना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति पूरी तरह समाप्त कर दी गई है, बल्कि बोर्ड को निर्धारित प्रक्रिया के तहत मामले पर पुनर्विचार करना होगा।
होटल संचालक को मिली बड़ी राहत
हाई कोर्ट के आदेश से होटल संचालक को अपनी बात विस्तार से रखने का अवसर मिल गया है। पर्यावरण संबंधी मामलों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्रवाई और क्षतिपूर्ति निर्धारण को लेकर प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है।
अदालत के इस फैसले को प्राकृतिक न्याय और उचित सुनवाई के अधिकार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की दोबारा सुनवाई और उसके बाद आने वाला आदेश इस मामले में आगे की दिशा तय करेगा।