लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश, संसद में बढ़ी सियासी हलचल

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नई दिल्ली, 10 फ़रवरी 2026 । लोकसभा में एक अहम घटनाक्रम के तहत स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश किया गया है, जिससे संसद की कार्यवाही और सियासी माहौल दोनों में गर्माहट आ गई है। यह कदम संसदीय परंपराओं के लिहाज से बेहद गंभीर माना जाता है, क्योंकि स्पीकर सदन के निष्पक्ष संचालन के लिए जिम्मेदार संवैधानिक पद होता है।

विपक्ष ने मंगलवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश कर दिया। इसमें 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। न्यूज एजेंसी IANS ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि ओम बिरला अब लोकसभा नहीं जाएंगे। अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद ही वह स्पीकर की चेयर संभालेंगे।

एजेंसी के मुताबिक विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में 9 मार्च को चर्चा हो सकती है। 13 फरवरी को बजट सत्र के वर्तमान सेशन का आखिरी दिन है। इसके बाद 8 मार्च से सदन की कार्यवाही फिर से शुरू होगी।

इससे पहले बजट सत्र के 10वें दिन संसद दो बार स्थगित हुई। दोपहर 2 बजे से संसद की कार्यवाही शुरू हो सकी। शशि थरूर ने बजट पर चर्चा की शुरुआत की।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाया जा सकता है। इसके लिए कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना आवश्यक होता है। यदि प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो उसे पारित करने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत पर्याप्त होता है। वर्तमान लोकसभा में 543 सदस्य हैं, इसलिए गणित और समर्थन का संतुलन इस प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाता है।

विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर द्वारा सदन की कार्यवाही चलाने में पक्षपात किया गया या कुछ मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा की अनुमति नहीं दी गई। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि यह कदम राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है और सदन की गरिमा को प्रभावित करने की कोशिश है। ऐसे मामलों में स्पीकर आमतौर पर प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अध्यक्षता नहीं करते, बल्कि डिप्टी स्पीकर या किसी अन्य नामित सदस्य द्वारा कार्यवाही संचालित की जाती है।

विश्लेषकों का मानना है कि भले ही यह प्रस्ताव पारित होना संख्याबल के आधार पर कठिन हो, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण होता है। इससे संसद के भीतर शक्ति संतुलन, विपक्ष की रणनीति और आगामी सत्रों की दिशा पर असर पड़ सकता है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह प्रस्ताव चर्चा तक पहुंचेगा और क्या सदन में इस पर व्यापक बहस होगी। फिलहाल, इस नोटिस ने संसद की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है।

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