PM केयर्स फंड पर सवालों को लेकर विवाद, संसद में प्रश्नों पर रोक का दावा
नई दिल्ली, 09 फ़रवरी 2026 । संसद में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थिति राहत कोष (PM CARES Fund) से जुड़े सवालों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कुछ विपक्षी सांसदों ने दावा किया है कि उन्हें इस फंड से संबंधित प्रश्न पूछने या विस्तृत चर्चा की अनुमति नहीं दी जा रही। इस दावे के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है।
कांग्रेस ने सोमवार को दावा किया है कि संसद में पीएम केयर फंड, पीएम राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) और राष्ट्रीय रक्षा कोष (NDF) से जुड़े सवाल नहीं पूछे जा सकेंगे। ये निर्देश सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय ने लोकसभा सचिवालय को दिए हैं।
कांग्रेस ने डेली न्यूज पेपर द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर शेयर करते हुए यह दावा किया है। इसमें बताया गया कि PMO ने लोकसभा सचिवालय से कहा है- इस बात का खास ध्यान रखा जाए कि संसद में कोई भी सदस्य इन फंड्स पर सवाल न उठाए।
इसके बाद कांग्रेस ने कहा है कि ये सीधे तौर पर तानाशाही है। संसद का अपमान है और सांसदों के अधिकारों पर हमला है। कांग्रेस ने X पर 4 सवाल किए-
- संसद जनता के प्रतिनिधि हैं, उन्हें जनहित के सवाल पूछने से क्यों रोका जा रहा है?
- मोदी सरकार जनता के लाखों-करोड़ रुपये का हिसाब क्यों नहीं देना चाहती?
- आखिर मोदी सरकार देश की जनता से क्या छिपाना चाह रही है?
- क्या अब देश की संसद नरेंद्र मोदी की मनमर्जी से चलेगी?
विपक्ष का कहना है कि चूंकि PM केयर्स फंड में बड़ी मात्रा में सार्वजनिक और कॉर्पोरेट दान आया है, इसलिए इसकी पारदर्शिता और उपयोग पर संसद में चर्चा होना जरूरी है। उनका तर्क है कि संसद सरकार से जवाबदेही तय करने का सर्वोच्च मंच है और किसी भी सार्वजनिक महत्व के फंड पर सवाल उठाना जनप्रतिनिधियों का अधिकार है।
वहीं सरकार की ओर से पहले भी यह कहा जा चुका है कि PM केयर्स एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में कार्य करता है और इसकी जानकारी निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत उपलब्ध कराई जाती है। सरकार का रुख रहा है कि फंड का उपयोग कोविड-19 जैसी आपात स्थितियों में चिकित्सा उपकरण, ऑक्सीजन प्लांट और राहत कार्यों के लिए किया गया।
संसदीय प्रक्रिया के अनुसार, किसी प्रश्न को स्वीकार या अस्वीकार करना लोकसभा/राज्यसभा सचिवालय के नियमों और अध्यक्ष/सभापति के विवेकाधिकार के तहत आता है। यदि किसी प्रश्न को नियमों के अनुरूप नहीं पाया जाता, तो उसे सूचीबद्ध नहीं किया जाता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा पारदर्शिता बनाम प्रक्रियात्मक नियमों की बहस का रूप ले सकता है। आने वाले सत्रों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस विषय पर विस्तृत चर्चा या स्पष्टीकरण दिया जाता है।