ICC भारत और पाकिस्तान को अक्सर एक ही ग्रुप में क्यों रखती है? खेल से ज्यादा रणनीति का मामला

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नई दिल्ली, जब भी ICC किसी बड़े टूर्नामेंट—टी-20 वर्ल्ड कप, वनडे वर्ल्ड कप या एशिया स्तर की प्रतियोगिता—के ग्रुप्स घोषित करती है और भारत-पाकिस्तान एक ही ग्रुप में दिखाई देते हैं, तो यह सवाल जरूर उठता है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या सोची-समझी रणनीति? सच्चाई यह है कि यह निर्णय खेल से कम और ग्लोबल क्रिकेट इकोनॉमिक्स, व्यूअरशिप और टूर्नामेंट वैल्यू से ज्यादा जुड़ा होता है।

पाकिस्तान ने टी-20 वर्ल्ड कप में भारत के खिलाफ मैच खेलने से मना कर दिया है। इसके बावजूद टीम इंडिया 15 फरवरी को कोलंबो रवाना होगी। जहां मैच खेला जाना है। टीम प्रैक्टिस भी करेगी, लेकिन मैच होगा या नहीं, इसका फैसला मैच रेफरी ही करेंगे।

वर्ल्ड कप के बीच इस विवाद से भी बड़ा सवाल यह है कि पिछले 12-13 साल से भारत-पाकिस्तान को हर ICC टूर्नामेंट के एक ही ग्रुप में क्यों रखा जाता है?

1992 में पहली बार दोनों टीमें वर्ल्ड कप के स्टेज पर आमने-सामने हुईं थीं। तब से 34 साल में 9 वनडे वर्ल्ड कप, 9 टी-20 वर्ल्ड कप और 9 चैंपियंस ट्रॉफी हुईं। 27 टूर्नामेंट में 22 बार भारत-पाकिस्तान मैच हुआ। 18 में भारत और महज 4 में पाकिस्तान को जीत मिली।

अक्सर इस पैटर्न को राजनीति से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं आगे जाती है। व्युअरशिप, ब्रॉडकास्टिंग राइट्स और टूर्नामेंट डिजाइन जैसे कई कारणों के चलते ICC भी हर बार भारत-पाकिस्तान मैच कराना चाहती है।

दूसरा अहम पहलू है ब्रॉडकास्ट रेवेन्यू मॉडल। ICC की कमाई का बड़ा हिस्सा मीडिया राइट्स से आता है, और ब्रॉडकास्टर्स सबसे ज्यादा बोली उन्हीं इवेंट्स के लिए लगाते हैं जिनमें भारत-पाक मुकाबला पक्का हो। अगर दोनों टीम अलग ग्रुप में हों और नॉकआउट तक न पहुंचें, तो यह हाई-वैल्यू मैच मिस हो सकता है। इसलिए ग्रुप स्टेज में ही इस मुकाबले की गारंटी टूर्नामेंट के जोखिम को कम करती है।

तीसरा कारण है वैश्विक फैनबेस का वितरण। भारत और पाकिस्तान दोनों के समर्थक एशिया के बाहर—मिडिल ईस्ट, यूके, ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका—में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। इस मैच के समय स्टेडियम टिकट, मर्चेंडाइज और डिजिटल एंगेजमेंट रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचते हैं। ICC इस उत्साह को टूर्नामेंट के शुरुआती चरण से ही भुनाना चाहती है ताकि इवेंट की चर्चा लगातार बनी रहे।

खेल के दृष्टिकोण से भी ICC इसे प्रतिस्पर्धी संतुलन के रूप में पेश करती है। दोनों टीमें ICC इवेंट्स में अक्सर मजबूत मानी जाती हैं, और उनका एक ही ग्रुप में होना ग्रुप स्टेज को ही हाई-प्रोफाइल बना देता है। इससे टूर्नामेंट की शुरुआत से ही दर्शकों की दिलचस्पी चरम पर रहती है, बजाय इसके कि वे सिर्फ नॉकआउट का इंतजार करें।

राजनीतिक संबंधों के कारण द्विपक्षीय सीरीज लगभग बंद रहने से ICC टूर्नामेंट ही एकमात्र मंच बन जाते हैं जहां यह मुकाबला संभव है। यही वजह है कि ICC शेड्यूलिंग में इस फैक्टर को नजरअंदाज नहीं करती। यह क्रिकेट प्रशासन का व्यावहारिक पक्ष है—जहां खेल, कूटनीति और व्यापार आपस में जुड़ जाते हैं।

हालांकि आलोचक कहते हैं कि यह “ड्रॉ की निष्पक्षता” पर सवाल खड़ा करता है, लेकिन ICC आमतौर पर इसे व्यावसायिक और दर्शक हितों के संतुलन के रूप में प्रस्तुत करती है। आधुनिक क्रिकेट में टूर्नामेंट की आर्थिक सफलता ही छोटे देशों के क्रिकेट विकास कार्यक्रमों को फंड करती है, और भारत-पाक मैच इस आर्थिक चक्र का बड़ा स्तंभ है।

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