संयम और समझदारी ही ईलाज है इस महामारी का

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आज आप सबों ने टेलीविज़न पर और दैनिक समाचार पत्रों में वे फोटोग्राफस देखे ही होंगे, जिनमें पटना और कलकत्ता में यात्री बसों में ठसाठस भरकर और छतों  पर चढ़कर अपने गाँव को जाने के लिए आतुर दिख रहे थे। अब इनकों कौन समझाये कि इनकी इस लापरवाही से कितनों की जान जा सकती है । एक बस यात्री को जब कोई चेतावनी दे रहा है तो वह बड़ी  ढीठाईपूर्वक कह भी रहा है कि मज़बूरी का नाम ही महात्मा गाँधी है । लेकिन, वह जिसे अपनी मज़बूरी बता रहा है, उससे वह न केवल अपने पूरे गाँव वालों को खतरे में डाल रहा है, बल्कि उन तमाम गावों की पूरी आबादी को भी, जिसके नागरिक उस बस में ठूंसकर भरे हैं । अपनी लापरवाही को मज़बूरी का नाम देने वाले ऐसे वेबकूफों को तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वे अपने साथ यदि इस जानलेवा बीमारी को लेकर अपने गाँव जा रहे हैं तो भगवान ही उनका रक्षक बन सकता है । आज इस सम्बन्ध में भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने भी यह स्वीकार किया है कि अबतक देशभर में 1,84,000 के करीब करोना महामारी से संभावित रूप से संक्रमित लोग मौजूद हैं, जो सरकार की निगरानी में हैं । यह तो मंत्री जी मात्र उनकी ही बात कह रहे हैं जो सरकार के संज्ञान में आ चुके हैं । लेकिन, जो अबतक सरकार के  संज्ञान में नहीं आ पाए, उसका अंदाजा कौन लगायेगा और उनपर निगरानी कैसे होगी और कौन करेगा ? यह उसकी दस गुनी यानि अठारह लाख भी हो सकती है और बीस गुनी भी ।

मुम्बई, चेन्नई, बेंगलुरु या गुजरात के किसी शहर से दहशत में भाग कर पूर्वांचल की ओर जाने वाले ये सारे गरीब मजदूर और अस्थायी  कर्मचारियों में से कुछ भी  यदि संक्रमण लेकर अपने गाँवों में पहुँच गए तो गावों में इस महामारी की चिकित्सा की क्या सुविधा उपलब्ध है, यह तो जगजाहिर ही  है। जब दिल्ली जैसे शहरों में वेंटिलेटर की भारी कमी है तो बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के गाँवों में या छोटे शहरों में किसी अस्पताल में कोरोना जैसे वायरस की पर्याप्त चिकित्सा की क्या व्यवस्था होगी, यह तो कल्पना करके भी रूह कांप जाती है । आज ही किसी चैनल पर लखनऊ से एक एम्बुलेंस कर्मी का बयान आ रहा था जिसमें वह कह रहा था कि लखनऊ में 85 एम्बुलेंस हैं जो मरीजों और मृतकों को ढोकर ले जाया जा रहा है। लेकिन, मुश्किल से इनमें से पांच एम्बुलेंसों के कर्मचारियों के पास ही पूरी तरह से ग्लोबस, माश्क और पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स) है, तब गावों का अंदाजा कर लें ।

एक रिसर्च में यह कहा जा रहा है कि एक संक्रमित व्यक्ति सामान्यत: 2.6 यानि लगभग ढाई अन्य व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है । लेकिन, यह रिसर्च शायद भारत के लिए  पूर्णतः गलत साबित हो सकता है । यह रिसर्च इटली और स्पेन के लिए तो कुछ हद तक सही हो सकता है, जहाँ कि आबादी बहुत कम है, सुविधाएँ ज्यादा हैं और जहाँ के लोग अपने स्वभाव से ही एक दूसरे से कम मिलते हैं या जरूरत होते पर ही मिलते हैं और पर्याप्त सामाजिक दूरी बनाकर रखते हैं । लेकिन, जहाँ हमारे देश में 130 करोड़ की आबादी है और क्षेत्रफल के अनुपात में हमारी आबादी चीन से भी कई गुना ज्यादा है । चीन की वैसे आबादी तो भारत से ज्यादा यानि 143 करोड़ की है, लेकिन, क्षेत्रफल के हसाब से चीन में प्रति वर्ग किलोमीटर मात्र 143 व्यक्ति रहते हैं, जबकि भारत में प्रतिवर्ग किलोमीटर 455 लोग रहते हैं । इसी प्रकार अमेरिका में प्रति वर्ग किलोमीटर मात्र 35, स्पेन में 91, ईरान में मात्र 49, फ्रांस में 122 ही लोग रहते हैं ।

यह महामारी यदि हमारे देश में तीसरी डिग्री पर यानि कम्युनिटी लेवल पर पहुंचा, तो क्या होगा । इसका अंदाजा इसी से लगा लीजिए कि अबतक चीन में 3277, अमेरिका में 593, स्पेन में 2311, ईरान में 1812, और फ्रांस में 860 लोगों की मौत हो चुकी है ।  ऐसी स्थिति में यहाँ पर तो एक संक्रमित व्यक्ति कई सौ लोगों को संक्रमित कर देगा । आज ही एक राष्ट्रीय दैनिक, अखबार में यह खबर छपी है कि लन्दन से एक डाक्टर साहब भारत आये हैं, जिन्होंने 300 लोगों को संक्रमित कर दिया है । यह संभव भी है । विदेशों में सामान्यत: न तो कोई किसी को एयरपोर्ट छोड़ने जाता है और न ही लेने जाता है । टैक्सी ने पहुंचा दिया एयरपोर्ट और वही रिसीव करने भी आ गया । पर हमारे यहाँ यदि कोई भाई-बन्धु विदेश से लौट रहा है तो पूरा गाँव उसे रिसीव करने पहुँच जाता है । और, जब कोई व्यक्ति विदेश से लौटता है तो गाँव के हर बुजुर्ग आदमी को पांव छूता है, नौजवानों को गले लगता है और हाथ मिलाता है और बच्चों को चूमता भी है । यह तो हमारे यहाँ की एक आम स्वाभाविक बात है । यदि कोई संक्रमित व्यक्ति ने ऐसा किया तो उसकी संक्रामकता के व्यापक प्रभाव का अंदाजा लगा सकते हैं । ऐसी स्थिति में हजारों की संख्या में गाँवों में संक्रमित लोग पहुँच गए तो इस महामारी को हम भारत वर्ष में फैलने से कैसे रोक सकते हैं ।

आज की ताजा अपडेट खबर है कि अबतक विश्वभर में 16 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें 462 लोग तो सिर्फ एक दिन में स्पेन जैसे सुन्दर से देश में मर गये । स्पेन जहाँ फ्लैटों में रहने की कोई पद्धति ही नहीं है और है भी तो बहुत ही कम । ज्यादातर लोग कोठियों और बाग-बगीचों के बीच में ही रहना  पसंद करते हैं । लेकिन, वहां भी महामारी की ऐसी विकराल स्थिति है । इटली जहाँ कि विश्व की दूसरी सबसे अच्छी चिकित्सा पद्धति का दावा किया जाता है, वह भी । आज महामारी का मुकाबला करने में नाकाम हो चुका है । ऐसे समृद्ध देशों में जब महामारी की यह स्थिति है तो भारत में यदि यह महामारी गाँवों में फैली तो उस स्थिति की तो कल्पना करना भी रोंगटे खड़े कर देने वाला है ।

अत: जहाँ भी पूरे देश में जगह-जगह कर्फू लगाये गए हैं, उसका पूरी सख्ती से पालन होना चाहिए । और, ऐसे लोग जो अपने गाँव जाने की जिद्द करना करते है, जरूर जाएँ । लेकिन, मेरी सलाह तो यह होगी कि गाँव में भेजने से पहले उन्हें किसी भी जिला अस्पताल में 14 दिन के आईसोलेसन में जरूर रखा जाये । उसके बाद ही उन्हें गाँव जाने दिया जाये । यदि उनका आईसोलेसन नहीं होता है और वे गाँव चले जाते हैं तो गंभीर खतरा है । यदि किसी भी गलती या लापरवाही की वजह से एक भी संक्रमित व्यक्ति गाँव में पहुँच जाता है तो वह पूरे गाँव ही को संक्रमित कर देगा और पूरा गाँव ही जब संक्रमित हो जायेगा तब इनकी चिकित्सा की व्यवस्था हम कहाँ से करेंगे ? तब तो भारत में 120 साल पहले जिस प्रकार से प्लेग फैला था, उसी प्रकार की स्थिति की ओर हम बढ़ रहे हैं ।        

कोरोना का संक्रमण मुख्य रूप से फेफड़ें की बीमारी है  और इससे फेफड़े को ही सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचता है । कोरोना का वायरस जब फेफड़े में पहुँच जाता है तो साँस लेने की दिक्कत और दम घुटने से व्यक्ति की जान चली जाती है । जो ज्यादा मात्रा में और नियमित अल्कोहल का सेवन करते है, तम्बाकू खाते है, जिन्हें सिगरेट बीडी पीने की आदत है, उनके तो फेफड़े तो पहले से ही कमजोर होते है । ऐसी स्थिति  में यदि  गाँवों में संक्रमण पहुंचा तो स्थिति भयावह हो जाएगी । क्योकि, गाँव में तो कोई पहले से इस प्रकार के भयंकर महामारी से निबटने की चिकित्सा की सुविधा है ही नहीं । अभी कल ही जबलपुर मेडिकल कॉलेज में 5 करोना के संक्रमित मरीज एडमिट किये गए, लेकिन, वहां  न तो वहां टिशू पेपर है, न  डस्टबिन है, न फेश मास्क है, न सेनिटईजर है, न हैण्ड गलोब्स हैं । तो जब देश के मेडिकल कॉलेज की यह स्थिति है, तो गांवों की स्थिति की कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं ।  ऐसी स्थिति में बंधुओं, कृपया करके गावों की तरफ संक्रमित व्यक्ति को ले जाने से रोकिये । यदि गावों की तरफ यह संक्रमण चला गया तो स्थिति बहुत ही विकराल हो जाएगी और संक्रमित लोगों की संख्या लाखों में पहुँच जाएगी । कितनी मौतें होगी इसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल होगा ।

पटना में भी जो एक मौत हुई है वह मध्य एशिया के क़तर देश से लौटे एक नवयुवक की हुई है । उम्र है मात्र 38 साल । इस घटना ने इस भ्रम को भी तोड़ा है कि सिर्फ  60 वर्ष  से ऊपर के लोगों पर ही कोरोना के संक्रमण का खतरा ज्यादा है । नौजवान मुंगेर जिले के किसी गाँव का रहने वाला था और क़तर से अपने गाँव लौट रहा था । या तो पहले से ही संक्रमित था या रास्ते में संक्रमित हो गया होगा । पटना एयरपोर्ट पर उतरते ही उसकी तबियत खराब हो गयी । तुरंत ही उसे पटना के इंदिरा गाँधी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ ईलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी । वह संक्रमण अपने गाँव तो नहीं ले जा पाया । किन्तु, क़तर से दिल्ली और फिर दिल्ली से पटना के रस्ते में कितने लोगों को उसने छुआ होगा इसका कोई अंदाजा नहीं है  और न रिकॉर्ड है । ऐसे ही संक्रमण फैलता है । अत : यह ध्यान रखना होगा कि कोई भी व्यक्ति दिल्ली से पटना या लखनऊ,गोरखपुर, वाराणसी, भुवनेश्वर, रांची, कोलकता या गुवाहाटी  पहुँच चुका हो तो वहां से उसे सीधे उसके गाँव न जाने दिया जाये ।  बिना आईसोलेसन (पृथकवास) के किसी  भी व्यक्ति का गाँव में प्रवेश ही न हो तभी जाकर इस समस्या का समाधान हो पायेगा अन्यथा नहीं हो पायेगा ।

अब जरा बेबकूफ ढीठों की भी बात कर लें । आज सुबह पटना में एक ऐसा ही ढीठ उसी अस्पताल में पहुँच गया जहाँ कल करोना से संक्रमित एक नौजवान की मृत्यु हुई थी । वह किसी मरीज को लेकर पहुंचा था । कल की घटना के बाद कड़ाई तो स्वाभाविक रूप से होगी ही । वह अपने को भाजपा का प्रवक्ता बताने लगा । हर पंक्ति में गाली गलौज और भारत के गृह मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री का नाम लेकर धमकी देता । जब वहां तैनात सुरक्षाकर्मी उसकी घौंस मानने को तैयार नहीं हुये तो मारापीटी पर उतर आया । किसी तरह से मामला शांत हुआ । ऐसे ढीठ मनचलों से भी सावधान  रहना होगा ।

अब जरा बात कर ले प्लेग के महामारी की भी । इसने एक सौ बीस साल पहले अपने देश में भयानक कहर ढाया था । वर्ष 1898-99 के दौरान पूरे देश में खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा में भयानक प्लेग फैला था । स्वामी विवेकानंद अपने शिष्यों के साथ सुबह उठते ही दिन-दिन भर लाशों को ढोते और दाह संस्कार करते । फिर भिक्षाटन में जो कुछ भी मिलता उसका खिचड़ी बनाकर रात में एक बार थोडा सा प्रसाद ग्रहण करते । उस समय विवेकानंद ने एक “घोषणा पत्र” पहले तैयार किया था प्लेग का । पहले यह “घोषणा पत्र” बंगला में बनाया गया था फिर उसे हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया । इसमें प्लेग के मरीजों के लिए और प्लेग के मरीजों के परिचायकों के लिए एक आचार संहिता बनाई गयी थी कि क्या करना है और क्या नहीं करना है । इस आचार संहिता की सख्ती से पालन का अनुरोध स्वामी जी ने किया था  जिसे लोगों ने सख्ती से पालन भी किया था ।

 ऐसी ही आचार संहिता की आवश्यकता आज भी हो गयी है, जिसका सख्ती से पालन होना जरूरी है । यह मोदी जी की आचार संहिता होगी । यह महामारी प्लेग की महामारी से ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह छूने मात्र से ही नहीं बल्कि खांसने, थूकने, नाक से पानी निकलने से भी फ़ैल रहा है ।

अत: इससे लड़ने का एक मात्र साधन है –सतर्कता, संयम और व्यापक जागरूकता तथा नियमों का सख्ती से पालन ।

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