राजनीति और अपराधः बेजोड़ संगम

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राजनीति के अपराधीकरण को लेकर अपने मुल्क की सर्वोच्च अदालत बेहद चिंतित है। राजनीति के अपराधीकरण से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस मुद्दे का मुआयना करने पर सहमति जताई है कि क्या राजनीतिक पार्टियों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में टिकट देने से रोका जा सकता है। माननीय कोर्ट ने इसे राष्ट्रहित का मामला बताते हुए कहा है कि इस समस्या को रोकने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे। पीठ ने चुनाव आयोग और याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर के सामूहिक प्रस्ताव देने के निर्देश दिए हैं। दरअसल पीठ एक वकील और नेता की अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया था कि इस मामले में 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार और उनकी राजनीतिक पार्टियां आपराधिक केसों की जानकारी वेबसाइट पर जारी करेंगी और नामांकन दाखिल करने के बाद कम से कम तीन बार इसके संबंध में अखबार और टीवी चैनलों पर देना होगा, लेकिन इस संबंध में कदम नहीं उठाया गया। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने पीठ को बताया कि अदालती आदेश का कोई असर नहीं हुआ है क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले 43 फीसदी नेता आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में बेहतर तरीका ये है कि राजनीतिक दलों को ही कहा जाए कि वे ऐसे उम्मीदवारों को न चुनें। पीठ ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि ये अच्छा सुझाव है। पीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों को बैठकर एक सुझाव देने को कहा है। आइए मामले की जड़ को तलाशने की कोशिश करें हमारे देश ने सैंकड़ों वर्षों पश्चात् सन् 1947 में अंग्रेजी दासत्व से आजादी पाई थी। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तरह से कुर्सी के लिए जीतो? संघर्ष आरंभ हुआ, सभी दल अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए साधनों की पवित्रता के गांधीवादी दृष्टिकोण को नकारने लगे, उसने राजनीति एवं अपराध के गठजोड़ को बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई। गुणवत्ता कभी भी हमारी चुनाव प्रक्रिया का आधार नहीं रहा है। यही कारण है कि योग्य व्यक्ति आगे नहीं आ पाते हैं और यदि आते भी हैं तो धन शक्ति का अभाव उन्हें पीछे खींच लेता है। इन परिस्थितियों में वे स्वयं को राजनीति से पूर्णतया अलग कर लेते हैं। परिणामतः राजनीति में वे लोग आ जाते हैं जिनमें स्वार्थपरता की भावना देश के प्रति प्रेम की भावना से कहीं अधिक होती है। ऐसे लोग ही हमारी जड़ों का दीमक की भांति खोखला करते हैं। राजनीति के अपराधिकरण की यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है पर आज इसमें काफी तेजी और बदलाव आ चुका है। पहले जहां अपराधियों का सहारा लेकर चुनाव जीता जाता था, आज वहीं अपराधी चुनाव जीत कर संविधान एवं स्वौधानिक संस्थाओं की गरिमा को गिरा रहे हैं। ऐसी स्थिति में लोगों का लोकतंत्र पर से विश्वास उठना स्वाभाविक है। जो हमें कम मतदाताओं की उपस्थिति के द्वारा भी संकेत के तौर पर प्राप्त होता है, जो कि लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है।

ऐसा माना जा सकता है कि एक अरसा पहले बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव हुआ था। वहां राजनीति से जुड़े कुछ लोगों को लगा कि चुनाव जीतने-हराने में बाहुबलियों की महत भूमिका हो सकती है और इसलिए इनका सहयोग लिया जाए। यहां से राजनीति के अपराधीकरण की शुरुआत हो गई जो बाद में दूसरे राज्यों में भी शुरू हो गया। मगर कुछ ही दिनों में बाहुबलियों को लगा कि अगर हम इनको बना सकते हैं तो खुद क्यों नहीं बन सकते हैं। यहां से इस देश की बदकिस्मती की एक और दास्तां शुरू होती है जिसका रोना हम आज तक रो रहे हैं। गुंडे राजनीति में आए और बड़े पदों पर पहुंचे और जो उनसे अपेक्षित था, आज वही देश की पूरी राजनीति में हो रहा है। आज कोई मूल्य नहीं हैं। कुछ गिनती के लोग अच्छे भी हैं पर हद यह हो गई है कि आज जब कोई खास नेता गिरी की ड्रेस पहनकर निकलता है तो बच्चे कहते हैं कि देखो साला बेईमान नेता जा रहा है। राजनीति और अपराध का गठजोड़ अनैतिक तरीकों से सत्ता हथियाने और सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए हुआ है। चुनाव परिणामों को प्रभावित करने तथा बलपूर्वक सत्ता पाने की लालसा ने अपराधियों को राजनीतिज्ञों ने निकट ला दिया है। उचित-अनुचित की परवाह किए बगैर अपराधियों की मदद की जाने लगी है। राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ावा देने में मतदाता भी बराबर का दोषी है। यदि मतदाता बिना किसी लालच में पड़े योग्य उम्मीदवार का चुनाव करे तो राजनीति के अपराधीकरण पर बहुत हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। राजनीति के अपराधीकरण को तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक जनता जागरूक न हो क्योंकि राजनीतिज्ञों का चुनाव जनता ही तो करती है। आजादी के समय देश के समस्त नेताओं ने ‘साम्राज्य’ के स्वप्न को साकार करने का संकल्प किया था परंतु वर्तमान में भारतीय राजनीति का अपराधीकरण जिस तीव्र गति से बड़ रहा है इसे देखते हुए कोई भी कह सकता है कि हम अपने लक्ष्य से पूर्णतया भटक चुके हैं। इसके लिए राजनीति का बुनियादी आधार बदलना जरूरी है।

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