मकर संक्रांति पर गरीबों और जरूरतमंदों को दान पुण्यकारी.

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भारत त्योहारों का देश है जिसमें देशवासी उमंग और उत्साह के साथ शामिल होकर अपनी खुशियों का इजहार करते है। लोकमंगल के त्योहार देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक बुनियाद को मजबूत बनाने और समाज को जोड़ने का काम करते हैं। गरीब से अमीर तक त्योहारों की खुशियों में खो जाते है। हमारे देश में सुख दुःख की बयार एक साथ बहती है जिसमें डूब कर लोग परम पिता परमेश्वर से सुख चैन और खुशहाली की कामना करते है। भारत में प्रत्येक पर्व और त्योंहार का अपना ऐतिहासिक महत्त्व होता है। ऐसा ही एक पर्व मकर संक्रांति है जो लोक मंगल को समर्पित है।

मकर संक्रांति इस साल 14 और 15 जनवरी को मनाई जा रही है। 14 जनवरी रात 2.08 बजे सूर्य उत्तरायण होंगे यानी सूर्य चाल बदलकर धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। संक्रांति काल 15 जनवरी सुबह 7.19 बजे से शाम 5.55 बजे तक रहेगा। मकर संक्रांति के साथ ही खरमास समाप्त हो जाएगा। विवाह आदि मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे। मकर संक्रान्ति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति का पर्व जिस प्रकार देश भर में अलग-अलग तरीके और नाम से मनाया जाता है, उसी प्रकार खान-पान में भी विविधता रहती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार मकर संक्रांति पर किये गये दान के कार्य अन्य दिनों के अपेक्षा सौ गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। यह त्योहार देश में पतंजबाजी के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। इस अवसर पर महिला और पुरुष सबेरे से शाम होने तक अपनी अपनी छतों वो काटा की करतल ध्वनि के साथ पतंगबाजी का आनंद उठाते है। इस दिन तिल का हर जगह किसी ना किसी रूप में प्रयोग होता ही है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि अगर मकर संक्राति के दिन तिल का दान या सेवन किया जाए तो इससे शनि देव प्रसन्न होते हैं। जिससे ऐसे व्यक्ति जिस पर शनि देव का कुप्रभाव है वह भी कम हो जाता है। इसलिए इस दिन काले तिल को दान करने की मान्यता है। तिल स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर सागर में जा मिलीं। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। मकर संक्रांति को मौसम में बदलाव का सूचक भी माना जाता है।

भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। बंगाल में इस पर्व पर गंगासागर पर बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। यहां इस पर्व के दिन स्नान करने के बाद तिल दान करने की प्रथा है। कहा जाता है कि इसी दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था। इसी दिन गंगा भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा सागर में जा मिली थीं। यही वजह है कि हर साल मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर में भारी भीड़ होती है।

बिहार में भी मकर संक्रांति को खिचड़ी के ही नाम से जानते हैं। यहां भी उड़द की दाल, चावल, तिल, खटाई और ऊनी वस्त्र दान करने की परंपरा है। इसके अलावा असम में इसे ‘माघ- बिहू’ और ‘ भोगाली-बिहू’ के नाम से जानते हैं।

तमिलनाडू में इस पर्व को चार दिनों तक मनाते हैं। यहा पहला दिन भोगी पोंगल दूसरा दिन सूर्य पोंगल, तीसरा दिन मट्टू पोंगल और चैथा दिन कन्या पोंगल के रूप में मनाते हैं। पूजा और अर्चना की जाती है। राजस्थान में इस दिन बहुएं अपनी सास को मिठाईयां और फल देकर उनसे आर्शीवाद लेती हैं। इसके अलावा वहां किसी भी सौभाग्य की वस्तू को 14 की संख्या में दान करने का अलग ही महत्व बताया गया है। महाराष्ट्र में इस दिन गूल नामक हलवे को बांटने की प्रथा है। तो इस तरह पूरे भारत में इस पर्व को अलग-अलग तरह की परंपराओं के साथ मनाया जाता है। नेपाल में भक्त इस दिन अच्छी फसल के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं और प्रार्थना करते हैं कि सभी पर उनकी कृपा हमेशा बनीं रहे। वहां इस पर्व को फसल का त्योहार या फिर किसानों के त्योहार के रूप में भी जानते हैं। नेपाल में मकर संक्रांति के दिन सार्वजनिक अवकाश होता है।

-बाल मुकुंद ओझा-

(वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

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