नेताओं के वादे .

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सत्ता पाने के मकसद से होने वाली चुनावी लड़ाइयों में वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए राजनीतिक
दलों की ओर से लुभावने वादे करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन विडंबना यह है कि चुनावी मौसम में वोट पाने
के लिए किए गए ऐसे ज्यादातर वादे किसी अंजाम तक पहुंचने का इंतजार ही करते रह जाते हैं। इसके बरक्स
हकीकत यह भी है कि कई राजनीतिक पार्टियां चुनावों में हर हाल में जीत के लिए मतदाताओं के सामने ऐसे वादे
भी कर देती हैं, जो दिखने में तो आकर्षक लगते हैं, लेकिन उनका आर्थिक बोझ दूसरे पहलुओं पर असर डालता है।
राजधानी दिल्ली में कुछ दिन बाद मतदान होना है तो उसके मद्देनजर सभी राजनीतिक दल अभी से कवायद में
लग गए हैं। भाजपा ने गरीबों को दो रुपए किलो आटा और पांच साल में 10 लाख नौकरियों का वादा किया गया
है। गरीब विधवा की बेटी की शादी में 50 हजार रुपए के उपहार देने का वादा भी है। कॉन्ट्रैक्ट वर्कर को जॉब
गारंटी, रेहड़ी-पटरी वालों को नियमित करने और पिछड़े और अति पिछड़ों के लिए अलग से बोर्ड बनाने का वादा भी
है। कांग्रेस ने बड़ा एलान वरिष्ठ नागरिकों को लेकर किया है। कांग्रेस अब वरिष्ठ नागरिकों को 5 हजार देने की
बात कह रही है। युवाओं के लिए के लिए भी बड़े एलान हैं।
आप ने भी पुरानी योजनाओं को जारी रखते हुए कई लुभावने वादे किए हैं। यों इस तरह के वादे सभी पार्टियां
करती रही हैं, लेकिन इस प्रवृत्ति से सवाल यह भी उठता है कि जनता को कोई सुविधा मुफ्त मुहैया कराने से
सरकार के कोष पर जो बोझ पड़ता है, क्या उसकी भरपाई जनता से ही नहीं की जाती है! आम आदमी पार्टी की
सरकार ने हाल ही में दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के तहत चलने वाली बसों में महिलाओं के मुफ्त सफर की
शुरुआत की। अब ताजा गारंटी कार्ड में विद्यार्थियों को भी सुविधा मुहैया कराने का आश्वासन दिया गया है। सवाल

है कि कार्यकाल के अंतिम दौर में महिलाओं के लिए और अब चुनाव को ध्यान में रख कर विद्यार्थियों के लिए
मुफ्त सफर के वादे को क्या लोभ की राजनीति नहीं माना जाएगा? दरअसल, राजनीतिक दलों के आकर्षक माने
जाने वाले वादे नागरिकों के आम अधिकार ही होते हैं। दिल्ली में सरकारी स्कूलों व मोहल्ला क्लीनिक जैसे कुछ
कामों को ‘आपÓ सरकार उपलब्धि बता सकती है।
लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के अधिकार को सरकार की ओर से अपनी उपलब्धि बताने को कैसे
देखा जाए? गुणवत्ता से लैस सस्ती चिकित्सा और शिक्षा, यातायात सुविधा जनता को मिलने वाले एक सहज
अधिकार होने चाहिए। समाज के किसी हिस्से के लिए मुफ्त सफर की व्यवस्था के समांतर जरूरी यह भी है कि
सार्वजनिक परिवहन के स्तर को उन्नत बनाया जाए। लेकिन दिल्ली में विश्वस्तरीय यातायात व्यवस्था की गारंटी
परोसने के बरक्स पिछले पांच साल में दिल्ली परिवहन निगम के बेड़े में कितनी बसें जुड़ीं, यह किसी से छिपा नहीं
है। इस मामले में सरकार का ज्यादा ध्यान क्लस्टर बसों का विस्तार करने पर रहा। पानी-बिजली के बिल में
सुविधा या सार्वजनिक परिवहन में मुफ्त सफर के वादे से ज्यादा जरूरी यह है कि जनता के बुनियादी अधिकारों को
लोभ का मुद्दा न बना कर उसे सरकार के दायित्वों के रूप में देखा जाए।

–सिद्धार्थ शंकर

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