किस करवट दिल्ली.

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दिल्ली के मतदाताओं ने अपना फैसला ईवीएम में कैद कर दिया है जो मंगलवार को सामने आएगा। हालांकि,
वोटिंग खत्म होने के बाद आए तमाम एग्जिट पोल आप को बहुमत मिलने की भविष्यवाणी कर रहे हैं जबकि
भाजपा की सीटें भी बढ़ सकती हैं जबकि कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन में सुधार होता नहीं दिख रहा है। किसी एग्जिट
पोल में उसे एक सीट मिलने की संभावना जताई गई है तो कुछ ने कहा है कि लगातार दूसरी बार राजधानी में
पार्टी का खाता भी नहीं खुल सकेगा। एक एग्जिट पोल ने बताया है कि कांग्रेस और भाजपा के वोट शेयर में वृद्धि
हो सकती है जबकि कांग्रेस की हिस्सेदारी घटकर 5 फीसदी तक सीमित हो सकती है।
लगातार 15 साल तक दिल्ली में शासन के बाद विदा हुई कांग्रेस पार्टी को 2015 के विधानसभा चुनाव में महज
10 फीसदी वोट मिल थे और पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था। 70 सीटों में से एक पर भी
कांग्रेस को जीत नसीब नहीं हुई थी। इस बार पार्टी बेहतर नतीजों की उम्मीद कर रही है, लेकिन एग्जिट पोल
इससे उलट बता रहे हैं। इंडिया टुडे-ऐक्सिस के एग्जिट पोल के मुताबिक, इस बार कांग्रेस को महज 5 फीसदी वोट
शेयर मिल सकते हैं। कुछ सर्वेक्षणों में संकेत दिया गया है कि पार्टी 2015 का रिकॉर्ड दोहरा सकती है जब इसने
70 विधानसभा सीटों में से 67 पर जीत का परचम फहराया था।
इन सबके बावजूद दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों पर वोटिंग के बाद सबके मन में सवाल उभर रहा है कि क्या
एक बार फिर पांच साल केजरीवाल का नारा बुलंद होगा या मोदी-शाह की जुगलबंदी की बदौलत भाजपा की जय-
जय होगी। हालांकि एग्जिट पोल के नतीजों में आम आदमी पार्टी को बंपर बहुमत मिलने का अनुमान लगाया गया
है। बात अगर मिडल क्लास वोटर की करें तो हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की इस वर्ग पर खास नजर होती है।
इस बार का चुनाव भी इससे अलग नहीं रहा। लेकिन खास बात यह है कि इस चुनाव में मध्यम वर्ग के मतदाता
एक ही मुद्दे से प्रभावित नहीं नजर आए। कुछ के लिए सड़क, बिजली-पानी जैसे स्थानीय मुद्दे अहम थे तो कुछ
ने राष्ट्रीय मुद्दों को तवज्जो दी। कई मतदाताओं ने माना कि पिछले साल के लोकसभा चुनाव से उन्होंने पाला
बदल लिया।

जो भी हो, अभी तो आप की सरकार बन रही है। मगर तनाव दोनों तरफ है। भाजपा और आप खेमे में धड़कनें
तेज है तो दिल्ली समेत पूरे देश की निगाहें 11 फरवरी पर लगी हैं। जब मतगणना के नतीजे आएंगे। इतने सारे
एग्जिट पोल्स के सामने जनता के मन में यह विचार आना स्वभाविक है कि आखिर वह किसपर भरोसा करें।
क्योंकि कई ऐसे मौके आ चुके हैं जब एग्जिट पोल पूरी तरह गलत साबित हुए हैं। एग्जिट पोल गलत साबित होने
के इतिहास पर नजर डालें तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण साल 2004 का लोकसभा चुनाव याद आता है। उस
दौरान सभी एग्जिट पोल में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिलने का अनुमान
लगाया गया था, लेकिन फाइनल रिजल्ट बिल्कुल उलट आए थे। इसके अलावा अगर दिल्ली की ही बात करें तो
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सारे एग्जिट पोल को झुठलाते हुए रिजल्ट हासिल किए
थे। इस बार सिर्फ परीक्षा भाजपा और आप की ही नहीं एग्जिट पोल की भी होनी है। अगर पोल के नतीजे फेल हुए
तो जनता पर विश्वास कमजोर होगा और सर्वे के बहाने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने वाले न्यूज चैनलों की मंशा पर
सवाल उठेगा।

-सिद्धार्थ शंकर

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