मोहन भागवत ने कहा-हम समय के साथ संगठन में बदलाव करने के लिए स्वतंत्र हैं

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तीन दिवसीय सम्मेलन के आखिरी दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विभिन्न विवादास्पद विषयों पर प्रश्नों के उत्तर दिए। जिसमें अंतर जातीय विवाह, शिक्षा नीति, महिलाओं के खिलाफ अपराध, गौरक्षा जैसे मुद्दे शामिल रहे। भागवत ने खुलेआम अपने विचारों को पेश किया लेकिन उनके भाषण से आरएसएस संगठन के गुरु रहे एम एस गोलवलकर का नाम गायब रहा। भागवत ने साफ कहा कि आरएसएस संगठन के गुरु रहे एम एस गोलवलकर के कुछ विचारों से सहमति नहीं रखता हैं और खुद में बदलाव ला रहे हैं। उन्होंने कहा कि संघ ने गुरु गोलवलकर की भाषणों के संग्रह की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के कुछ हिस्सों को त्याग दिया है क्योंकि ये वक्त की मांग है।

भागवत ने कहा कि गुरु गोलवलकर की पुस्तक के उन शब्दों को भी भूल जाइए जिससे भय उत्पन्न होता था। कुछ बातें देश काल के हिसाब से बोली जाती है, गुरुजी के विजन और मिशन पर लिखी गई पुस्तक में ऐसी कोई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ बंद संगठन नहीं है, समय बदलता है, हमारी सोच बदलती है। बदलने की परमिशन डॉ केशव बलिराम हेडेगवार से मिलती है, जिन्होंने कहा कि हम समय के साथ संगठन में बदलाव करने के लिए स्वतंत्र हैं।

आरएसएस प्रमुख ने इस समारोह ने विभिन्न ऐसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी, जिनपर आरएसएस का दृष्टिकोण संकीर्ण माना जाता है साथ ही उन्होंने संघ की बदलती हुई छवि को भी पेश करने की कोशिश की। उन्होंने अन्य मुद्दों पर पूछे गये सवालों के उत्तर में उन्होंने जम्मू कश्मीर का भी उल्लेख किया। भागवत ने कहा कि आरएसएस संविधान के अनुच्छेद 370 एवं 35 ए स्वीकार नहीं करता। संविधान का अनुच्छेद 370 राज्य की स्वायत्तता के बारे में है जबकि अनुच्छेद 35 ए राज्य विधानसभा को यह अनुमति देता है कि वह राज्य के स्थायी निवासियों को परिभाषित करे।

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