न्यायालय ने सीएए के खिलाफ दायर नई याचिकाओं पर केंद्र से जवाब तलब किया.

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नई दिल्ली, । उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल मूल के 20 लोगों की ओर से संशोधित नागरिकता कानून-2019 (सीएए) की संवैधानिकता और गृह मंत्रालय की ओर से इसे लागू करने के लिए जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार को केंद्र से जवाब तलब किया। प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए पूर्वी वर्द्धमान के इसरारुल हक मंडल और अन्य 19 की ओर से दायर याचिका को इस मामले में लंबित अन्य याचिकाओं से सबद्ध कर दिया जिस पर 22 जनवरी को सुनवाई होनी है। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 18 दिसंबर को सीएए की संवैधानिकता की समीक्षा करने का फैसला किया था जबकि इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। संशोधित कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक आए हिंदू, सिख, पारसी, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है। नई याचिका में गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए कहा गया है,‘‘ सीएए की धाराएं 2,3,5,6 संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद-19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती हैं।’’ याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय की अधिसूचना और सीएए संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है और धर्मनिरपेक्षता, समानता, जीवन की गरिमा और बहुलवाद को कमतर कर संविधान के मूल ढांचे पर चोट करता है। याचिका में आरोप लगाया है कि सीएए और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का उल्लेख नागरिकता कानून 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय परिचय पत्र का वितरण)-2003 की धारा का संबंध है। हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी,जैन और ईसाई समुदाय के लोगों को ‘‘ धार्मिक उत्पीड़न की कल्पना ’’के आधार पर नागरिकता मिल रही है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया, ‘‘ सीएए और नियमों से लाखों भारतीय नागरिकों (मुस्लिमों) को संदिग्ध नागरिक घोषित किए जाने का खतरा है। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने सीएए के खिलाफ अखिल भारतीय मुस्लिम लीग और कांग्रेस नेता जयराम रमेश सहित 60 याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।

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